भारत का सीमान्त स्वरूप

भारत की भूमि पर सदियों के विदेशी शासन का 15 अगस्त 1947 को जब अन्त हुआ, तो वर्तमान भारत का नक्शा बना, जिसके पश्चिम में पाकिस्तान नाम का देश है। इसके पूर्व अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में रूस से वार्ता कर 1834 से 1876 के बीच अफगानिस्तान को गण्डामक संधि द्वारा अलग देश की मान्यता दी। 1904 में नेपाल से संधि, 1906 में भूटान, 1914 में तिब्बत बफर स्टेट और इसी तरह श्रीलंका 1934, म्यांमार 1937 और 1947 में मालदीप भी अलग देश बना दिये गये। उत्तर में हिमालय के पार तिब्बत पर चीन ने बलपूर्वक कब्जा कर लिया और वह हमारे सिर पर आ गया। 1947 में पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान बना जो 1971 के युद्ध में पाक व बांग्लादेश के रूप में विभाजित हो गया। तब से ही पाक (पश्चिम और पूर्व) की ओर से लगातार भारत की सीमा में घुसपैठ होती आ रही है।

“सुरक्षित सीमा-शक्तिशाली भारत” सीमा संगठनों का ध्येय वाक्य है। हम भारतवासी ही वास्तव में अपने देश की स्थायी सीमा के रक्षक है तथा सेना, बी.एस.एफ. आदि शासकीय रक्षा पंक्ति हैं। भारत के राष्ट्रीय चरित्र का आदर्श बने सीमावर्ती समाज। इस धरती के हम याने समाज मालिक है, और सरकार इसकी रक्षक है। हमारी सजगता, जागरूकता का अर्थ यह नहीं है कि हम भी शस्त्र लेकर हर समय सीमा पर पहरा देते हैं, बल्कि अपने-अपने गाँवों, नगरों में निवास करते हुए, हमारी आँखें खुली हैं, बुद्धि जागृत है, अपना-पराया हमें दिखाई देता है और हम उसका ध्यान रखते है।

संगठित राष्ट्र का श्रेष्ठ उदाहरण है अपना शरीर। एक ही रक्त-मांस-मज्जा से बना शरीर कितना एकरूप है कि सोया हुआ मनुष्य भी मक्खी, मच्छर या चींटी के काटे जाने पर सुप्तावस्था में हाथ की हरकत करता है और उसे हटाता है। यह जो सहजता शरीर व्यवहार की है, इसी तरह से सहज ही शरीर की चमड़ी की संचेतना की तरह देश की सीमाओं का भी चिन्तन समाज में होना चाहिये। संगठित समाज में कोई भेदभाव नहीं रहता, सबका हित-अहित भी समान रहता है। समाज में किसी भी कारण देश के हितों को चोट पहुँचे, ऐसा भेद पैदा नहीं होना चाहिए। अपनी आपसी समस्या हम हल कर लेंगे, लेकिन किसी गैर को और उसके उल्टे विचार और संस्कृति को अपने घर में प्रवेश करनें की अनुमति नहीं देंगे। ऐसा समरस समाज जब एक लक्ष्मण रेखा जैसी शक्ति बनकर खड़ा हो गया, उस दिन से भारत का भाग्य बदल जायेगा।

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