उन्नीसवें कुशोक बकुला

विजयदशमी के अवसर पर माननीय सरसंघचालक मोहन~भागवत~जी ने कुशोक बकुला जी का नाम अपने उद्भोदन में लिया। उनके बारे और अधिक जानने की उत्सुकता मन में हुई। कुछ पुस्तकें देखी और अंत में खोजते खोजते यह विचार किया कि क्यों न सोनम वांकचुक जी से इस विषय पर जानकारी प्राप्त की जाए। सोनम जी 25 वर्ष तक बकुला जी के आधिकारिक सचिव रहे। आज भी वे मिलने वालों को बकुला जी के बारे में अध्ययन करने के लिए प्रेरित करते हैं। अपनी जिज्ञासा के बारे में जब ‘सीमा संघोष’ की टोली ने उन्हें बताया तो बिना विलंभ के हमें मिलने का समय दे दिया। बातचीत के कुछ अंश इस अंक में प्रकाशित करते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है। बकुला जी के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों की जानकारी सोनम जी ने हमें दी।

आप को बकुला जी सा सानिध्य कैसे प्राप्त हुआ? कैसे आपने यही रास्ता चुना?

रिंपोछे ने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत कार्य किया उन्होंने कई स्कूल खोले। मेरी शिक्षा भी ऐसे ही एक स्कूल में हुई है जो की दिल्ली के समीप गाज़ियाबाद में स्थित है। उस विद्यालय में वे प्रवास पर आते रहते थे। मैं उनके जीवन से बहुत प्रभावित रहा। कॉलेज में पढ़ते समय मैं उनकी सेवा किया करता था। फिर आजीवन उनके कार्यों में सहयोग करने का निश्चय किया। 1979 से मुझे बकुला जी के साथ आधिकारिक रूप में कार्य करने का अवसर मिला। 2003 तक उनके देवाहसान तक 25 वर्ष उनके साथ ही रहा।

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सोनम वांकचुक

सोनम जी, विभिन्न स्थानों पर बकुला जी के नाम की अलग अलग वर्तनी मिलती है। ऐसा क्यूं है? वे स्वयं अपना नाम कैसे लिखते थे?

उन्हें बचपन में ‘ग्यालस्रस बकुला’ नाम से संबोधित किया जाता था। परन्तु बाद का आधिकारिक नाम ‘कुशोक बकुला’ ही है। कहीं ‘कुशक’ तो कहीं ‘कुशोग’ तो कहीं ‘कुशाग्र’ लिखा जाता है परन्तु आधिकारिक ‘कुशोक’ ही है। वे स्वयं अपना हस्ताक्षर लद्दाकी लीपि में करते थे जिसमें वे ‘ग्यालस्रस बकुला’ लिखते थे।

बकुला जी संविधान सभा के सदस्य थे, फिर वे जम्मू कश्मीर विधानसभा के लिए भी चुने गए, बाद में सांसद बने और इसके पश्चात राजनयिक भी रहे। उनके द्वारा चलाए गए समाजिक कार्यों की गिनती करना भी कठिन है। इतना कुछ होने के बाद भी बकुला जी के बारे में पढ़ने के लिए बहुत कम सामग्री मिल पाती है। क्या उन्होंने अपनी आत्मकथा नहीं लिखी?

1990 में मंगोलिया में मैने बहुत आग्रह किया रिंपोछे से आत्मकथा लिखने के लिए। मैने कहा कि आप इतना कुछ कर चुके हैं भारत की आज़दी के पहले से अब तक। यह इतिहास है इसे लिखना चाहिए। हर बार वे यही कहते – “मैने किया ही क्या है, सब लोगों ने ही किया है”। हर कार्य का श्रेय वे दूसरों को ही देते।

फिर एक दिन मैं जब बीजिंग में था तो रिंपोछे के लिए मैंने पुस्तिका और कलम ख़रीदे और उन्हें दिए। वे हंसे और आश्वासन दिया कि वे लिखना प्रारंभ करेंगे। किया भी। परन्तु फिर कुछ दिन के बाद लिखना बंद कर दिया। उन्हें लिखना ज्यादा पसंद नहीं था। फिर मैंने एक सहयोगी की व्यवस्था की और आग्रह किया कि आप केवल बोल दिया कीजिए यह बालक लिख दिया करेगा। उन्होंने भोटी भाषा में अपनी आत्मकथा पूर्ण की। मैने उसमे कुछ फोटो डाल दिए। जिससे लोगों को रिंपोछे के जीवन के बारे में पता चल सके।

दुर्भाग्य से भोटी भाषा की समझ मुझे उतनी नहीं है। बाद में जब मैंने आत्मकथा का अनुवाद करवाया तो पाया कि बकुला जी ने अपनी उपलब्धियों के बारे में कुछ अधिक लिखा ही नहीं है। उन्होंने बहुत कुछ किया है लद्दाक के लोगों के लिए, देश के लिए। फिर मैंने ही उनके जीवन के बारे में लिखने का निश्चय किया।

बकुला जी 1990 तक राजनीति में रहे। उनके राजनैतिक जीवन से जुड़े कोई रोचक प्रसंग जो आपको याद आते हों।

यह मेरे रिंपोछे के साथ जुड़ने से पहले की बात है। बहुत पहले की। बकुला जी 1949 में विधानसभा के सदस्य बने। 1952 के बजट में जब लद्दाख का नाम तक नहीं आया तो वे अन्दर तक पीड़ित थे। तब रिंपोछे भी नेश्नल कॉनफ्रैंस के ही सदस्य थे। असमंजस में थे कि कैसे अपनी ही पार्टी के विरुद्ध आवाज़ उठाई जाए।

उन्होंने एक विधी सोची। विधानसभा स्पीकर ‘ग़ुलाम मोहम्मद सादिक’ से बजट पर बोलने का समय मांगा। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी या हिन्दी उन्हें आती नहीं है और भोटी भाषा में ही बोलना शुरू दिया। बीच बीच में वे ‘जनाब शेख़ अब्दुल्ला’ बोलते तो सभी सदस्य टेबल थपथपाने लगते। ‘अबदुल्ला जी’ भी खुश हुए। भाषण समाप्त कर के उन्होंने एक प्रतिलिपि स्पीकर को दी और स्पीकर महोदय ने वही प्रतिलिपि प्रेस में दे दी। सभी समाचार-पत्रों में अनुवाद छपा। अब्दुल्ला जी पढ़कर आग-बबूला हो गए। रिंपोछे ने भाषण में बजट की धज्जियाँ उड़ा रखी थीं। दबाव में आकर बजट में परिवर्तन भी करना पड़ा।

आपकी पुस्तक में बकुला जी को आपने ‘आधुनिक लद्दाख के वास्तुकार’ बताया है। लद्दाक की जनता के लिए बकुला जी का क्या योगदान रहा?

जब रिंपोछे का जन्म हुआ था लद्दाक एक छोटी रियासत थी। क्या हालत रही होगी आप सोचिए जब हम छोटे थे तब भी वहाँ रेडियो तक नहीं था। बैटरी तक नहीं मिलती थी। दूसरी कोई और चीज़ तो आप छोड़ ही दीजिए। और सोचिए रिंपोछे तो हम से आयु में बहुत बड़े हैं। उनके समय तो कुछ भी नहीं होगा। शिक्षा केवल बौद्ध संघ से मिलती थी। आधुनिक शिक्षा वहाँ नहीं थी।

जब 1940 के दशक में बदलाव आ रहे थे तो लद्दाख एक रियासत थी और बौद्ध बाहुल्य क्षेत्र का झुकाव तिब्बत की ओर था। 1948 में श्रीनगर-लेह मार्ग भी नहीं था। कुछ भी हो सकता था। हवाई अड्डा भी बाद में बना। रिंपोछे ने ही लोगों को तैयार किया कि उनका भविष्य भारत में ही सुरक्षित है। बाद में तिब्बत पर चीन का अधिकार हो गया। तब उनके कथन सही साबित हुए। वे बहुत बड़े दृष्टा थे। लोग शायद ना मानते हों मैं उन्हें स्वतंत्रता सैनानी ही मानता हूँ। राष्ट्र के लिए उनका बहुत बड़ा योगदान है।

उन्होंने शिक्षा पर बहुत ज़ोर दिया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान भुलाए नहीं जा सकते। अपने जीवन काल में उन्होंने अनेकों विद्यालयों का निर्माण स्वयं करवाया जिनमें पहाड़ों से आने वाले विद्यार्थी पढ़ सकें। लद्दाख स्कूल ऑफ हायर स्टडीज़ उन्होंने खुलवाए। गाज़ियाबाद स्थित लद्दाख स्कूल बाद में विशेष केन्द्रीय विद्यालय (VKV) में परिवर्तित हो गया था। दुर्भाज्ञपूर्ण है कि यह स्कूल भी अब बंद हो चुका है। बकुला जी प्रयास करते रहे। तब के मंत्री मुरली मनोहर जोशी जी ने 2003 में विद्यालय फिर से खुलवाने के लिखित आदेश भी दिए। परन्तु यह विद्यालय किन्हीं अज्ञात कारणों से फिर नहीं खुल पाया। उन्होंने सारनाथ (काशी से 10 कि.मी. पूर्वोत्तर) में भी लद्दाख स्कूल खुलवाया। वर्तमान में लद्दाख के सांसद थुप्सतान छेवांग जी भी इसी विद्यालय से पढ़े हैं। यह विद्यालय पहले तो सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी से सम्बद्ध था बात में केन्द्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान के अंतर्गत इसे लाया गया।

मंगोलिया में दस वर्ष आप बकुला जी के साथ रहे। कैसा रहा वहाँ का कार्यकाल? क्या कठिनाइयाँ थी?

मंगोलिया जाने की कहानी भी रोचक है। रिंपोछे को राजीव गांधी ने मंगोलिया जाने को कहा। करण सिंह जी को अमरीका। परन्तु चुनावों की घोषणा हो गई थी तो रिंपोछे ने मना कर दिया जाने से। पता नहीं अगली सरकार किसे नियुक्त करे। हुआ भी ऐसा ही। सरकार बदली और जो गए थे वे वापस बुलाए गए। परन्तु जब नई सरकार के विदेश मंत्री श्री इंद्र कुमार गुजराल मिले तो उन्होंने पूछा – “आप अभी तक मंगोलिया गए नहीं?” फिर सरकार ने रिंपोछे से मंगोलिया जाने का आग्रह किया। रिंपोछे मंगोलिया गए। 1990 से 2000 के बीच में कई सरकारें बदली। हर बार रिंपोछे अपना त्यागपत्र भेजते और हर बार ही उनका त्यागपत्र अस्वीकार किया जाता। कई बार तो मंगोलिया के नगरिक, वहाँ की सरकार ही भारत सरकार से आग्रह करते कि रिंपोछे को यहीं रोका जाए। राजदूत ना बदले जाएं।

बाद में मंगोलिया में कुछ लोग प्रश्न भी करने लगे कि एक बौद्ध भिक्षु को क्या चाहिए। क्यूँ फिर रिंपोछे यह वेतन और भत्ता लेते हैं। आपको जान कर हैरानी होगी कि रिंपोछे ने वापिस आते समय अपना सारा वेतन एक बौद्ध मठ बनाने में खर्च कर दिया। और फिर वह मठ भी वहीं के लोगों को भेंट कर आए। 70 वर्ष के वामपंथी शासन ने वहाँ सभी कुछ नष्ट कर दिया था, स्टालिन के समय में, बौद्ध मठ बचे ही नहीं थे। रिंपोछे का बहुत बड़़ा योगदान वहाँ की बौद्ध संस्कृति को पुनर्जीवित करने में है। 1990-2000 तक का समय मंगोलिया में पुनर्जागरण का माना जाता है।

लगभक सभी राजनैतिक पर्टियों से उनके संबंध अच्छे थे। अटल जी से कैसे संबंध थे उनके?

एक बार की बात है 1980 के दशक में हम चंडीगढ़ जा रहे थे तो दिल्ली के अन्तर्राज्यीय बस अड्डे पर खड़े थे। सामने से अटल जी आ रहे थे और ऐसे मिले जैसे दो गहन-मित्र मिलते हैं। विरोधी पार्टियों में होते हुए भी लोग उनका बहुत सम्मान करते था।

अंत में जब उनको निमोनिया हुआ 2003 में तब वे बीजिंग में थे। तब उनके पास कोई आधिकारिक पद नहीं था। मैने भारत के तत्कालीन राजदूत को सूचना दी। उन्होंने सहानुभूति व्यक्त की परन्तु उनके पास और कोई रास्ता नहीं था। मैं जैसे ही लौटकर जाने लगा तो पीछे से एक महानुभाव बुलाने आए। हुआ ये कि राजदूत महोदय ने अटल जी से बात की और अटल जी ने तुरन्त बिना किसी रोकटोक इलाज का पूरा खर्चा उठाने को कहा है। एयर एेंबुलैंस जिसका कि खर्च भी तब 1 लाख 60 हज़ार अमरीकि डॉलर था वह भी अटल जी की सरकार ने उठाया।

अंत तक अटल जी से घनिष्ट मित्रता रही।

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विभिन्न देशों से प्राप्त सम्मान

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दिल्ली स्थित आवास पर कुशोक बकुला जी का कक्ष

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कुशोक बकुला जी एवं वाजपाई जी की भेंट की तसवीर दिखाते हुए सोनम वांकचुक जी

[सोनम वांकचुक जी ने मुझे वह कक्ष भी दिखाया जिसमें बकुला जी ध्यानमग्न रहा करते थे। कुछ छाया चित्र मैं यहां लगा रहा हूँ। आशा है आपको प्रेरित करेंगे।]

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