घटती बारिश और परंपरागत खेती में बदलाव की आवश्यकता

नवमासधृतं गर्भं भास्करस्य गभस्तिभः ।
पीत्वा रसं समुद्राणां द्यौः प्रसूते रसायनम् ॥

 

~वाल्मीकि रामायण

वाल्मीकि रामायण के इस श्लोक का अर्थ है कि, ‘नौ महीने तक आसमान ने सूर्य किरणों के माध्यम से समुद्रों का पानी पिया है, और अब वे वर्षा बुंदों, जो कि जिंदगी की पारस मणि है, को जन्म दे रहे है।’

उपरोक्त श्लोक वर्षा को जीवन की पारसमणि कहकर उसके महत्व की अत्यंत सटीक व्याख्या करता है। वर्षा भारत के जनमानस के लिए किसी पारसमणि से कम नहीं है। आज भी भारत की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है, जो की मुख्यतः वर्षा आधारित है। इंद्रदेव को वर्षा का भगवान माना गया है, तथा जून माह शुरू होते ही किसान उसकी आस लगानी शुरू कर देते है। जुलाई आते-आते वर्षा का इंतजार बढ़ जाता है, और यदि जुलाई आधे से ज्यादा बिन बारिश बीत जाये तो किसानों के चेहरे पर मायूसी छाने लगती है और अकाल के संकट का अंदेशा होने लगता है।

आज जब वर्ष प्रतिवर्ष वर्षा का अनुपात कम होता जा रहा है तथा अकाल की बारंबारता बढ़ती जा रही है तो हमे परंपरागत खेती की प्रासंगिकता पर एक बार फिर से विचार करने को मजबूर होना पड़ रहा है। आज की हमारी वर्षा आधारित कृषि लगभग वो ही है जो आज से सौ साल पहले थी, उसमे सिर्फ इतना बदलाव आया है की पहले के बैल और ऊंट की जगह अब ट्रैक्टर का उपयोग होने लगा है। बीज और उत्पादकता आज भी वो ही है, जबकि पशुओ और मनुष्यो की संख्या मे कई गुना वृद्धि हो गयी है। तो प्रश्न उठता है कि, क्या हम आज की जनसंख्या का पोषण पहले जैसी कम उत्पादकता के साथ कर सकते है? क्या हम इतने अकालों को बार बार झेल सकते है ? स्पष्ट उत्तर है, नहीं। तो फिर क्यू हम मरूस्थल को उनुपयोगी बनाते जा रहे है।

आज मरूस्थल का कोई भी किसान सिर्फ खेती के सहारे जीवन यापन नहीं कर सकता, और ऐसे परिवार जिनमे कोई वयस्क पुरूष नहीं है, सिर्फ खेती के भरोसे गरीबी का जीवन जीने के लिए मजबूर है। पश्चिमी राजस्थान के किसी भी और कितने भी बड़े खेत के मालिक के पास बिना अच्छी बारिश के जीवनयापन का कोई साधन नहीं है। पशुपालन भी पूर्णतः कृषि पर ही निर्भर है, तथा कम चारे के कारण किसान सिर्फ एक-दो गाय भैंस ही रख सकता है, जिससे किसी प्रकार की कोई नकद आय नहीं होती है। ऐसी स्थिति मे किसान को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। गाँवों में रोजगारोन्मुख तथा गुणवत्ता युक्त शिक्षा के अभाव मे आजअधिकतर युवा 10वीं-12वीं पास करके शहर मे मजदूर का जीवन जीने के लिए मजबूर है, और कुछ युवा गलत संगति मे पड़कर छोटे-मोटे अपराधों मे संलग्न हो जाते है।
ऐसे परिदृशय में गाँवों के किसानों के लिए कृषि की नयी तकनीकें तथा उत्पादकता बढ़ाने वाले गैर-हानिकारक खाद-बीज इत्यादि अपरिहार्य हो जाते है। आज हमें इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि राज्यों के एवं केंद्र के कृषि मंत्रालय/विभाग नयी कृषि तकनीकों को किसानों तक पहुचाने में कमोबेश असफल रहे हैं। हमें सभी ऐसी संस्थाओं, जो कि कृषि क्षेत्र मे काम कर रही है (चाहे सरकारी हो या गैर-सरकारी) को पूर्णतया नवाचार से प्रेरित करना होगा ताकि वो सक्रिय होकर किसानों एवं कृषि के पुनरुत्थान के लिए कार्य कर सकें। किसानों को भी ऐसे सभी नवाचारों में रुचि दिखाकर आधुनिक कृषि को अपनाना होगा जो सस्टेनेबल हो और लाभकारी हो।

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