अफस्पा और उत्तर पूर्व

हाल ही मे खबर आई की केन्द्र सरकार ने पूर्वोत्तर भारत के मेघालय से पूर्णतः तथा अरुणाचल प्रदेश से आंशिक तौर पर अफस्पा हटाने का निर्णय लिया है। अब यह कानून जम्मू-कश्मीर सहित पूर्वोत्तर के मणिपुर, नगालैंड, असम जैसे राज्यों में ही शेष रह गया है।

केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद अफ्स्पा पे फिरसे चर्चा शुरू हो गई है। अफस्पा को लेकर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार की राय देश में मौजूद रही है। जहां तथाकतिथ मानवाधिकार संगठनों और बुद्धिजीवियों द्वारा हमेशा से इसके विरोध में स्वर मुखर किए जाते रहे हैं तथा इसे काला कानून कहा जाता रहा है। वहीं देश का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखने के लिए यह कानून आवश्यक है।

क्या है अफस्पा अथवा सशस्त्र बल विशेष शक्तियाँ अधिनियम

सशस्त्र बल विशेष शक्तियाँ अधिनियम भारतीय संसद द्वारा 11 सितंबर 1958 में पारित किया गया था। अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड के ‘अशांत इलाकों’ में तैनात शैन्य बलों को इस कानून के तहत विशेष अधिकार हासिल है। इस कानून के अंतर्गत सशस्त्र बलों को तलाशी लेने, गिरफ्तार करने व बल प्रयोग करने आदि में सामान्य प्रक्रिया के मुकाबले अधिक स्वतंत्रता है तथा नागरिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेही भी कम है। उत्तरपूर्व में जैसे जैसे इलाके शांत होते गए है, वैसे वैसे इस कानून के दायरे को कम किया गया है। वर्ष 2015 में त्रिपुरा से इस कानून को हटा लिया गया था।

लागू होने की प्रक्रिया

धार्मिक, नस्लीय, भाषा, क्षेत्रीय समूहों, जातियों, समुदायों के बीच मतभेद या विवादों के कारण जब शान्ति बहाल करना मुश्किल हो जाता है तब संबंधित राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र द्वारा उस क्षेत्र को ‘अशांत’ घोषित कर वहाँ अफस्पा लागू किया जाता है तथा केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती की जाती है।

क्यों जरुरी है अफ्स्पा

सुरक्षाबलों को अफस्पा के तहत जिन क्षेत्रों में तैनात किया जाता है, वे कोई शांतिप्रिय क्षेत्र नहीं होते जहाँ सब कुछ आम जीवन जैसा चलता हो, बल्कि वे घोषित रूप से ‘अशांत’ क्षेत्र होते हैं। प्रायः वे ऐसे ही क्षेत्र होते हैं, जहाँ कहीं भी कोई आतंकी तत्व हो सकता है। ऐसी जगहों पर यदि इस प्रकार के अधिकार सुरक्षाबलों के पास न रहें और हर कार्रवाई से पहले उन्हें अनुमति की विविध स्तरीय प्रक्रिया से गुजरना पड़े तो निःसंदेह उनके लिए काम करना किसी कवच के बिना मौत के मुँह मे जाने जैसा होगा। अतः अफस्पा का विरोध करने वाले मानवाधिकारवादियों को हमारे सुरक्षाबलों के मानवाधिकार के विषय में भी सोचना चाहिए।

मेघालय में अफ्स्पा हटने के सांकेतिक अर्थ

मेघालय की सुरक्षा स्थिति में उल्लेखनीय सुधार को देखते हुए वहाँ से अफस्पा हटाया गया है। पिछले साल यानि 2017 में वहाँ उग्रवाद की सबसे कम घटनाएँ हुई हैं। चार साल से हिंसा में गिरावट जारी है। ऐसा दो दशकों में पहली बार देखने को मिला है। वर्ष 2000 की तुलना में 2018 में 85 प्रतिशत कम हमले हुए। मेघालय में अफ्स्पा हटने से न सिर्फ पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों को बल्कि पड़ोसी देशों को भी ये सकारात्मक सन्देश जायेगा की पूर्वोत्तर शान्ति की ओर बढ़ रहा है।

एक्ट ईस्ट निति को मिलेगा बल

एक्ट ईस्ट नीति भारत द्वारा द॰ पू॰ एशिया के देशों के साथ बड़े पैमाने पर आर्थिक और सामरिक संबंधों को विस्तार देने, भारत को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने और इस इलाके में चीन के प्रभाव को संतुलित करने के उद्देश्यों से बनाई गई निति है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे इसी एक्ट ईस्ट निति का नतीजा है। इस निति की सफलता के लिए उत्तर पूर्व के राज्यों में शांति व्यवस्था को कायम रखना अति आवश्यक है।

कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि पूर्वोत्तर को लेकर दिल्ली की सोच में अब परिवर्तन आ रहा है। अब दिल्ली के लिए पूर्वोत्तर और उसके मुद्दे महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। अच्छी बात यह भी है कि वहां उग्रवाद में कमी भी देखने को मिल रही है। उग्रवाद के खिलाफ भारत सरकार का कड़ा रुख और साथ ही पूर्वोत्तर के राज्यों में विकास की गति को दिए गए बल से यहाँ के राज्यों को देश के अन्य विकसीत राज्यों की श्रेणी में लाने का सपना पूर्ण किया जा सकता है।

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