चीन में पी॰एम॰ मोदी का परचम

अप्रैल के आख़िरी हफ्तों में ‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’ की रवायत एक बार फिर माहौल में गूँज रही है। ये रिश्ता है एक शक्तिशाली पड़ोस के दूसरे मज़बूत पड़ोस के साथ। वो रिश्ता, जो वक़्त के तकाज़ों की वजह से ग़ुमनामी के अँधेरे में खो गया था। ग़लतफ़हमियाँ और नाउम्मीदी इतनी की दोनों एक दूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए। हालत ये थी की वैश्विक पटल पर मज़बूत शक्तियाँ इनको एक दूसरे के ख़िलाफ़ मोहरा बना रही थीं। लेकिन, घुप अँधेरे को भी जब घुटन होने लगे तो वो भी उजाले की टिमटिमाती लौ तलाश ही लेती है। कुछ ऐसा ही हाल रहा पिछले हफ़्ते अप्रैल के आख़िरी महीने में जब दक्षिण एशिया की दो शक्तियाँ हाथों में हाथ डालकर रिश्तों की नई परिभाषा लिख रहे थे।

हम बात कर रहे हैं, अप्रैल महीने में पीएम मोदी की अनौपचारिक चीन यात्रा की, जब 27 और 28 अप्रैल को दक्षिण एशिया की दो महाशक्तियाँ एक दूसरे के हाथों में हाथ डाल रिश्तों की नई इबारत लिख रही थीं और पूरे विश्व की नज़रें भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात पर लगी थीं। पूरा विश्व अचरज में था कि आखिर एक दूसरे को फूटी आँख न सुहाने वाली दो महाशक्तियाँ ईस्ट लेक के बीचों बीच साथ चाय पी रही थीं।

जिस तरह से ह्यूबेई प्रान्त में स्थित चीन के शिकागो कहे जाने वाले वुहान शहर में पीएम मोदी का स्वागत हुआ, और वुहान के एयरपोर्ट पर ‘भारत माता की जय’ के नारे लगे, इतिहास उस अभूतपूर्व घटना का साक्षी बन उसे अपने डायरी में दर्ज कर रहा था जिसके जरिए आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय विदेश नीति के संस्कार को सीख सकेंगी।

भारत के कट्टर दुश्मन रहे चीन का अपनी धरती पर किसी भारतीय प्रधानमंत्री के भव्य स्वागत की ये अपने आप में अनोखी घटना है। जब वुहान की बेहद ख़ूबसूरत ‘ईस्ट लेक’ झील में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारतीय प्रधानमंत्री एक साथ नौका विहार कर रहे थे और राष्ट्रपति शी जिनपिंग उनके लिए चाय परोस रहे थे।

भारतीय विदेश नीति के जानकारों के लिए भी पीएम मोदी का अनौपचारिक चीन दौरा हैरान करने वाला था। क्योंकि, इधर पहले डोकलाम और फिर चीन पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से दोनों देशों के बीच तनाव का माहौल था। लेकिन, पीएम मोदी की चीन यात्रा ने चीन को ना सिर्फ़ पड़ोस के धर्म की याद दिलाई बल्कि, उसे आपस में विवादों के हल के निपटारे के लिए एक साथ आने को विवश भी किया।

चीनी मीडिया में पीएम मोदी के दौरे की कवरेज इसका बड़ा उदाहरण है। जब चीन के बड़े अखबार ‘चाइना डेली’ ने लो चाओहुई के हवाले से लिखा कि, दो देशों के बीच मतभेद होना सामान्य बात है लेकिन, दोनों देशों के बीच आपसी समझौतों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। वहीं, चीन के प्रभावशाली अख़बार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने लिखा कि ‘पीएम मोदी और शी जिनपिंग की ये मुलाक़ात भारत और चीन के रिश्तों की एक नई शुरूआत है’। इस लेख में कहा गया है कि चीन को भारत को ये दिखाना चाहिए कि बीजिंग नई दिल्ली के ख़िलाफ़ काम नहीं करता है और उसके विकास में बाधक नहीं है।

वहीं, पाकिस्तान के मुद्दे पर अख़बार ने चीनी सरकार को सलाह दी कि भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान को मोहरा नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही चीन ‘पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ के तहत सिर्फ आर्थिक विकास को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाए। कुल मिलाकर चीनी मीडिया ने भी पीएम मोदी और शी जिनपिंग की इस अनौपचारिक मुलाक़ात को दोनों देशों के बीच मज़बूत होते रिश्ते के तौर पर देखा और उम्मीद जताई कि भविष्य में भी दोनों देशों के बीच ऐसे ही रिश्ते बने रहेंगे।

पीएम मोदी की चीन यात्रा के दौरान भारत और चीन के बीच सीमा पर शान्ति बनाए रखने, अपनी अपनी सेनाओं के सम्पर्क को मज़बूत करने और आपसी विश्वास और समझ बनाए रखने को लेकर चर्चा हुई, और दोनों देशों ने एक साझा आर्थिक परियोजना पर काम करने को लेकर सहमति जताई। ज़ाहिर से भारत और चीन के इस कदम से पाकिस्तान को परेशानी हो सकती है।

दोनों देशों के प्रमुखों के बीच कई दौर की बैठकों में आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे भी छाए रहे। भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत और चीन ने शान्तिपूर्ण बातचीत के माध्यम से आपसी मतभेदों को दूर करने पर जोर दिया।

अगर इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो भारत और चीन के बीच काफ़ी समय से सीमा विवाद एक गम्भीर मुद्दा बना हुआ है। जिसे लेकर 1962 में दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ उसके बाद पिछले साल सिक्किम के डोकलाम में दोनों देशों के बीच 73 दिनों तक गतिरोध बना रहा था। जोकि, अगस्त में आपसी बातचीत के जरिये विवाद हल हुआ था।

भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत और चीन के बीच सन्तुलित और लम्बे समय तक चलने वाले व्यापार और निवेश को बढ़ाना चाहिए। इसके अलावा जो सबसे अहम बात ये रही कि आतंकवाद के मुद्दे पर भी चीन भारत से सहमत दिखा और भारत के साथ चीन ने भी आतंकवाद की कड़ी निन्दा करते हुए आतंकवाद से मुक़ाबला करने के मसले पर सहयोग को लेकर ज़ोर दिया।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि चीन की यात्रा कर पीएम मोदी ने अपनी विदेश नीति, कूटनीति और सामरिक दृष्टि का नमूना दिखाया है, कि किस तरह से हम पड़ोसियों से अच्छे सम्मबन्ध बना सकते है। भले ही हमारा पड़ोसी कैसा ही हो, लेकिन है तो हमारा पड़ोसी ही। पीएम मोदी की इस चीन यात्रा के दूरगामी परिणाम नज़र आएँगे जो कि भारत को विश्व की महाशक्ति बनाने में मील का पत्थर साबित होंगे।

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