क्या भारत एक साथ चीन और पाकिस्तान से युद्ध लड़ सकता है?

पाकिस्तान और चीन के साथ दो मोर्चों पर एक साथ जंग की नौबत आने के सवाल और इस हालत से निपटने की देश की तैयारी के बारे में तीनों सेना प्रमुखों के बयान एक रणनीतिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। उनके बयान आश्वस्त करने वाले हैं लेकिन रक्षा प्रतिष्ठान के भीतर चल रही सोच, सामरिक तैयारी और ऐसी स्थिति से निपटने के युद्ध सिद्धांत के बारे में चल रहे मंथन का संकेत देते हैं। एयरचीफ मार्शल बी एस धनोआ से जब पूछा गया कि वायु सेना दो फ्रंट जंग के लिए किस हद तक तैयार है तो उन्होंने साफ कहा कि वह पूरी तरह तैयार हैं। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत भी कह चुके हैं कि पश्चिमी पड़ोसी यानी पाकिस्तान से सुलह की गुंजाइशें उन्हें नजर नहीं आती क्योंकि वहाँ की सेना और राजनीतिक पार्टियाँ अपने मुल्क को यह समझा चुकी हैं कि भारत उनका दुश्मन है जो हर हाल में पाकिस्तान को तोड़ने को आमादा है। लिहाजा भारतीय सेना ढाई मोर्चें पर युद्ध के लिए तैयार है। उन्होंने दो मोर्चों के बाद आधा मोर्चा आतंकवाद को भी जोड़ लिया। नौसेना दिवस के मौके पर नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा ने भी हिंद महासागर में अपनी तैयारियों के बारे में कहा कि पाकिस्तान के मुकाबले भारतीय नौसेना कहीं आगे है जबकि चीन पर भी उनका पलड़ा भारी है। इस सवाल के जवाब में कि 2050 तक आते आते चीनी नौसेना की ताकत दुनिया में बहुत आगे निकलने के अनुमान जाहिर किए जा रहे हैं, एडमिरल लांबा ने कहा कि उस समय तक भारतीय नौसेना की ताकत भी अब से कहीं अधिक होगी।

तीनों सेना प्रमुखों के आत्मविश्वास भरे बयान से देश को संतोष होना चाहिए लेकिन एक बात गौर करने लायक है कि उन्होंने दो मोर्चों पर एक साथ युद्ध होने की संभावना से इंकार नहीं किया। पिछले सत्तर का साल इतिहास देखें तो भारत ने पाकिस्तान की ओर से छेड़े गए कम से चार बड़े युद्ध का सामना किया और आतंकवाद के रुप में एक प्रकार का परोक्ष युद्ध हमेशा ही चलता रहा है लेकिन इस दौरान कभी भी ऐसा नहीं लगा कि चीन ने इन मौकों पर भारत से लगी सीमा को गर्म किया हो। पाकिस्तान के दुस्साहसी कृत्यों के समय चीनी नेतृत्व हमेशा दूसरी ओर देखता आया है। इन युद्धों के समय चीनी नेताओं के बयान भी नही सुनाई दिए जिनसे लगा हो कि उनकी ओर से आग में घी डालने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में सेना प्रमुखों का स्वाभाविक जवाब यह होना चाहिए था कि दो मोर्चों पर जंग की नौबत नहीं आएगी। अतीत में इस आशय के जवाब मिलते रहे थे। लेकिन अब तैयारियों के पुख्ता होने की बात कही जा रही है तो कहीं न कहीं साउथ ब्लॉक के रक्षा प्रतिष्ठान में विचार मंथन कहीं गहरे पैठ गया है कि बदली हुई परिस्थितियों में भारत के साथ टकराव के समय पाकिस्तान और चीन की सेना के बीच कोई जुगलबंदी हो सकती है।

यह सामरिक विचार और इस चुनौती का सामना करने के नए सिद्धांतों पर काम चल रहा है। चीन और पाकिस्तान के बीच इस जुगलबंदी के ठोस कारण दिखते हैं। हाल में भूटान के साथ चीन और भारत के बीच ट्राई जंक्शन पर डोकलाम में जो कुछ हुआ उस समय पाकिस्तान की ओर युद्ध विराम के उल्लंघन के बढ़ते प्रयासों से भविष्य की तस्वीर झलक गई थी। यह कम से कम डेढ़ मोर्चे पर टकराव की स्थिति थी। चीनी विशेषज्ञ माने जाने वाले सेना के अवकाश प्राप्त जनरल ने आॅफ रिकॉर्ड बताया कि डोकलाम में भारतीय नेतृतव की मजबूती और परिपक्वता दोनों ही सामने आई जो किसी कमजोर सरकार के समय नहीं हो सकता था। जनरल ने कहा कि चीन यह मन से चाहता है कि भारत में कमजोर सरकार रहे क्योंकि इसमें उसका हित छिपा है। कमजोर सरकार रहते चीन अपना कूटनीतिक एजेंडा चला सकता है क्योंकि डावांडोल सरकार घरेलू राजनीति में उलझी रहेगी और विदेशी मामलों में भारत मजबूत बिसात नहीं बिछा पाएगा जो पिछले पाँच साल में संभव हो सकता। दूसरी ओर पाकिस्तान भी सीमा पार से अपने दावं आसानी से चल पाएगा।

भारत के साथ पाकिस्तान की निर्बाध शत्रुता भी चीन को सुहाती है। भारत को कमजोर करने का साझा एजेंडा इस्लामाबाद और पेईचिंग की दोस्ती का धागा है जो हाल के समय में बहुत मजबूत होता दिख रहा है। इसके अनेक कारण हैं। भारत की सीमा से लगते हुए पूरे पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता हुआ 46 अरब डॉलर का आर्थिक गलियारा इस सामरिक युति का ओवरब्रिज है। यह चीन के रोड एंड बैल्ट इनिशिएटिव का बड़ा हिस्सा है। पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे में रखने के दीर्घकालिक इरादे को भी यह कॉरिडोर पुख्ता करता है। हालाँकि इस क्षेत्र में पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों के अड्डे खुद चीन के लिए भी परेशानी का सबब हैं क्योंकि पेईचिंग को लगता है कि आज नहीं तो कल यह आतंकी संगठन उसके आर्थिक कॉरिडोर को भी निशाना बना सकते हैं। यही कारण है कि वर्तमान समय में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को चीन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बचा रहा है। मौलाना मसूद अजहर अगर आतंकवादियों की सूची में शामिल नहीं हो पा रहा है तो पेईचिंग इसके लिए खुले तौर पर जिम्मेवार है जो इस काम में तकनीकी अड़ंगे लगाता रहा है।

पाकिस्तान का अफगान एजेंडा भी उसे चीन की ओर धकेल रहा है। अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी है और आने वाले वर्षों में यह बरकरार रहेगी, यह सामरिक सच्चाई है। ऐसे में अमेरिकी नेतृत्व चाहता है कि पाकिस्तान के फाटा क्षेत्र में चल रही आतंक की फैक्ट्रियाँ बंद हों जहाँ से अफगानिस्तान में तबाही मचाई जाती है। दूसरी ओर पाकिस्तान के इस क्षेत्र के लिए यह आतंकी फैक्ट्रियाँ रोजी रोटी का साधन बन चुकी हैं। आतंक उनकी अर्थ व्यवस्था को पोषित करता है। हर परिवार इससे जुड़ा है। उस पर हमला होना इस क्षेत्र के अवाम पर हमला है। चीन के साथ दोस्ती पाकिस्तान को ऐसे में मजबूत आड़ देती है। अमेरिका को वह पेईचिंग के बल पर ब्लैकमेल कर सकता है। अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन ने कुछ समय पहले पाकिस्तान के लिए 30 करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता रोकी तो प्रधानमंत्री इमरान खान ने तेवर दिखाने शुरु कर दिए। उन्होंने यहाँ तक कहा कि पाकिस्तान को किराए की बंदूक के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। परोक्ष धमकी यह है कि अगर इस्लामाबाद को ज्यादा दबाया गया तो वह पूरी तरह चीन के साथ हो जाएगा।

वैसे सच्चे मायनों में पाकिस्तानी नेतृत्व, वहाँ की सेना और अवाम की सोच पहले ही चीन के साथ समायी हुई है। पाकिस्तान जो काम 70 साल में नहीं कर पाया वह चीन 1962 में ही कर चुका है। भारत से लगातार चोट खाने वाले पाकिस्तान के लोगों के लिए इससे सुखद और क्या हो सकता था कि उसके दुश्मन को कोई युद्ध में परास्त कर दे। पाकिस्तानी सेना का 60 प्रतिशत साजो सामान चीनी है। उसका दोयम दर्जे का शस्त्रागार आतंकवादियों के काम आता है। यानी आतंक आधारित अर्थव्यवस्था के लिए भी यह दोस्ती मजबूत आलंबन देती है।

ऐसे में रुस के साथ भारत की मित्रता ही है जो कहीं न कहीं पाकिस्तान एवं चीन के गठजोड़ का तोड़ नजर आती है। अफगानिस्तान के घटनाक्रम को लेकर मास्को में जो कुछ हुआ, वह इस बात की गवाही है। वहाँ रुस ने तालिबान के साथ बातचीत के रास्ते खोले। इसमें अफगानिस्तान की सरकार ने भी अपने प्रतिनिधि भेजे। भारत की ओर दो गैर सरकारी प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया लेकिन उनका चयन भारत सरकार ने किया था। यानी इस सम्मेलन को भारत का परोक्षा समर्थन था। अफगानिस्तान में भारत, रुस और चीन तीनों के ही सरोकार हैं। अमेरिका चुपचाप इन तीनों देशों को अफगानिस्तान में मजबूत होते देखना चाहता है क्योंकि काबुल से वह अपना बोरिया समेटना चाहता है। अफगान युद्ध उसे आर्थिक चोट पहुँचा रहा है। रुस अफगानिस्तान का पड़ोसी है। वहाँ उसके ऐतिहासिक सरोकार हैं। चीन हमेशा से अफगानिस्तान के खनिजों पर निगाह गढ़ाए है। लेकिन पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर अफगानिस्तान शांत होगा तो उनकी विघ्नकारी शक्ति कमजोर हो जाएगी। चीन भी पाकिस्तान की न्यूसेंस वैल्यू बने रहने देना चाहता है। यह भारत को परेशान करने और अमेरिका को ब्लैकमेल करते रहने के लिए जरुरी है। भारत को महाशक्ति बनने से रोकने के लिए भी चीन के हाथ में यह एक बड़ा औजार है।

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