अनुच्छेद ३७०: एक भूल सुधार

अनुराग पाण्डेय

भारत सरकार के द्वारा अनुच्छेद ३७० की समाप्ति के घोषणा के साथ ही यह आज चर्चा का विषय बना
हुआ है। धारा ३७० पर चर्चा करने से पूर्व इसकी इतिहास का अवलोकन करना आवश्यक है। इस अंक में
हम धारा ३७० की पृष्ठभूमि तथा उसके इतिहास का अवलोकन करेंगे। महाराजा हरिसिंह के शासन के
समय जम्मू एवं कश्मीर अपने सभी क्षेत्रों में लगभग बेहतर कार्य कर रहा था उनके शासनकाल में अनेक
उल्लेखनीय प्रशासक जैसे गोपाल स्वामी आयंगर, महाराज सिंह और किन राव जैसे व्यक्ति शामिल थे।
वर्ष 1932 में शेख अब्दुल्ला ने एक आंदोलन की शुरुआत की थी। यह आंदोलन पूर्ण रूप से मुसलमानों
के हितों के लिए था। शेख अब्दुल्ला की संस्था जिसका नाम कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस था उसका नाम
इस आंदोलन के बाद बदलकर नेशनल कांफ्रेंस रख दिया गया। इसके उपरांत नेशनल कांफ्रेंस संस्था को
शेख अब्दुल्ला ने राज्य प्रजा परिषद से जोड़ दिया। यह बात सर्वविदित है कि अतिमहत्वकांछी शेख
अब्दुल्ला ने तत्कालीन कांग्रेसी नेतृत्व के प्रभाव में आकर तथा उनके कहने पर महाराजा कश्मीर छोड़ो
नमक आंदोलन वर्ष 1946 में शुरू किया। इसके दौरान शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया तथा
3 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। उस समय कांग्रेस को यह बात पता तो थी कि पंडित नेहरू जो
स्वयं जम्मू कश्मीर से आते थे उनका शेख अब्दुल्ला के प्रति काफी झुकाव था। वर्ष 1946 में शेख
अब्दुल्ला की इसी आंदोलन के दौरान गिरफ्तारी हुई। इस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस नहीं चाहती थी कि
पंडित नेहरू वहां जाएं और किसी भी प्रकार से शांति व्यवस्था में खलल पैदा हो। हालांकि पंडित नेहरू
सभी की बातों को दरकिनार कर कश्मीर पहुंचे और वहां गिरफ्तार कर लिए गए। एक बात यहां जो
उल्लेखनीय है वह कि सरदार पटेल नेहरू जी के शेख अब्दुल्ला के प्रति आवश्यकता से अधिक झुकाव
के कारण बेहद नाराज रहते थे। इस प्रकार के झुकाव का जिक्र उनकी एक पत्र में भी है जहां उन्होंने
नेहरू जी के नादानी से हुई परेशानियों का जिक्र किया है। पंडित नेहरू को गिरफ्तार किये गए और
कारावास की सजा झेल रहे शेख अब्दुल्ला से उनके वकील के रूप में मिलने की अनुमति मिली थी।
इसके बाद से पंडित नेहरू, अब्दुल्ला के समर्थन में पूरी तरह से खुलकर आ गए। भारत की आजादी की
तिथि पर एक नए राष्ट्र जो की धार्मिक आधार पर बन रहा था का भी उदय होना था। उसके पूर्व अनेक
ऐतिहासिक साक्ष्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि लॉर्ड माउंटबेटन महाराजा हरि सिंह को पाकिस्तान में
सम्मिलित होने को उकसा रहे थे।

 सरदार पटेल इन सभी परिस्थितयों और तेजी से हो रहे भौगोलिक परिवर्तन पर नजर बनाये हुए थे। अतः उन्होंने समय को भाप कर जम्मू कश्मीर के महाराजा और वहां के प्रधानमंत्री को पत्र के द्वारा भारत में विलय करने का सुझाव पहले ही दे दिया था। महाराजा भी यही सोच रहे थे कि धर्म के नाम पर उदय हो रहे नए राष्ट्र के साथ जुड़ना किसी भी तरह से उचित नहीं होगा क्योंकि जम्मू कश्मीर में हिंदू बौद्ध तथा मुस्लिमों की मिश्रित आबादी थी। यह भिन्नता नवनिर्मित राष्ट्र में भयावह असर पैदा कर सकती थी। पाकिस्तान का उदय हो चुका था और वह अपने उदय के साथ ही आतंकवाद के सरपरस्ती का कार्य भी शुरू कर चुका था। अपनी गलत भावनाओं के चलते यही आत्मविश्वास जिन्ना को भी था की वह भारत को कभी भी अस्थिर कर सकता है। जिन्ना के शागिर्दो ने अपने उदय के साथ ही कबाइलियों को कश्मीर पर आक्रमण के लिए उकसाना शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने उनको हथियार और प्रशिक्षण भी देना शुरू कर दिया था। शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान की इस चाल की जैसे ही इसकी खबर लगी, उसने तुरंत महाराजा को अपने समर्थन का पत्र भेज दिया। महाराजा उस समय की तत्कालीन परिस्थितियों से इतने घबराए हुए थे कि उन्होंने सभी कैदियों को मुक्त करने का आदेश दे दिया । कबाइली आक्रमण को रोकने में महाराज की सेना पूरी तरह से अक्षम हो चली थी। इस प्रहार को महाराज की सेना इसलिए भी नहीं रोक पाई क्योंकि उनकी सेना में धार्मिक रूप से संगठित एक वर्ग युद्ध से भाग खड़ा हुआ। हालांकि उनकी मौजूदगी से भी कोई व्यापक परिणाम नहीं निकलता लेकिन इन विषम और विपरीत परिस्थितियों के कारण महाराजा ने भारत से जुड़ने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन की अध्यक्षता में एक बैठक आयोजित हुई और वहां भारत ने सैन्य मदद की कार्यवाही शुरू कर दी। भारत की कार्यवाही से  कश्मीर से कबाइलियो को खदेड़ दिया गया। यहाँ एक बात अहम् है की बाकि रियासतों के विलय के विषय की तरह भारत तथा कश्मीर के जुड़ाव के मुद्दे को सरदार पटेल देख रहे थे। लेकिन शेख अब्दुल्ला और नेहरू जी की करीबी एक बार फिर से रंग लाई और पंडित नेहरू फिर से इस मामले में सक्रिय होना प्रारंभ हो गए। भारत की मदद से कबाइलियो को खदेड़ने के बाद पाकिस्तान बौखलाया हुआ था। इसी बौखलाहट से जिन्ना लॉर्ड माउंटबेटन के पास पहुंच गए। दोनों ने एक दूसरे के समक्ष कश्मीर को लेकर कई तरह के मसौदे रखें हालांकि जिन्ना ने किसी भी मसौदे को मानने से इंकार कर दिया। जिन्ना इस बात को लगातार नकारता रहा कि पाकिस्तानी सेना का युद्ध में किसी भी तरह से हाथ था। बाद में अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने इस बात को जगजाहिर कर दिया कि इस लड़ाई में सीधे पाकिस्तान शामिल था। इसके बाद बचे खुचे पाक के सैनिकों को भारत छोड़ना पड़ा ।

पंडित नेहरू ने इस मामले को विदेश निति से जोड़ना शुरू कर दिया। अब जब यह मामला विदेश मंत्रालय के पास पहुंच गया और नेहरू जी के कहने पर स्वामी आयंगर ने इन सभी मामलों में अपना सुझाव देना शुरू कर दिया। जब पाकिस्तानी सैनिक कश्मीर से वापस जा रहे थे ठीक उसी समय संयुक्त राष्ट्र संघ कमीशन के प्रभाव में पंडित नेहरू साहस नहीं दिखा पाए। यह मामला यहीं से थोड़ा बिगड़ गया जबकि पाकिस्तान ने इस लड़ाई में अपनी संलिप्तता से इंकार कर दिया। विभाजन के समय जैसा कि तय हुआ था कि भारत की सरकार पृथक हो रहे नए देश को ५५ करोड़ की हिस्सेदारी देगी। सरदार पटेल उस वक्त भी यह नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान को यह आर्थिक मदद मिले। सरदार पटेल को अंदाजा था की पाकिस्तान इस पैसे का दुरुपयोग ही करेगा। हुआ भी वैसा ही पाकिस्तान ने यह राशि मिलते ही अपने सैन्य संसाधनों में भारी बढ़ोतरी कर दी। पाक सैनिकों की वापसी के बाद पंडित नेहरू के प्रिय शेख अब्दुल्लाह अपने आप को वहां का शासक मानाने लगे। कुछ समय बाद नेहरू जी की कृपा से वो महाराजा के साथ शासन भी करने लगे। कुछ समय तक अब्दुल्ला इस बात पर सहमत थे कि कश्मीर में भी सरदार पटेल के द्वारा तैयार की गई मैसूर व्यवस्था  का अनुकरण किया जाएगा । नेहरू जी के प्रभाव में शेख अब्दुल्ला ने कुछ समय बाद ही महाराजा का पुरजोर विरोध करना शुरू कर दिया। पंडित नेहरू ने स्वामी आयंगर को महाराजा और शेख अब्दुल्ला के बीच मध्यस्थता का कार्य दिया। स्वामी शेख अब्दुल्ला की बात मनवाने पर अड़ गए और महाराजा को शेख अब्दुल्ला की शर्तों को मानने के लिए कहने लगे। इससे आहत होकर महाराजा के विश्वस्त मेहर चंद ने सरदार पटेल को एक पत्र लिखा और उसमें शेख अब्दुल्ला के द्वारा किए जा रहे कुकृत्यों का उल्लेख किया। उन्होंने सरदार पटेल को बताया की कैसे शेख अब्दुल्ला महाराजा के अधिकारों की अवहेलना कर रहे है, हाईकोर्ट के जजों को जम्मू नहीं जाने दिया जा रहा है, अनेक लोगों को गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे शेख अब्दुल्ला हिंदुओं को नौकरियों से निकाल रहे हैं और एक जाति विशेष के लोगों को नौकरी और पदोंन्नति दी जा रही है। शेख अब्दुल्ला ने महाराजा का विरोध करना जारी रखा। हालांकि बाद में शेख अब्दुल्ला और पंडित नेहरू के गठजोड़ के चलते महाराजा मुंबई में रहने को तैयार हो गए। अब यह बात जानना बहुत आवश्यक है कि धारा ३७० के जनक पंडित नेहरू, शेख अब्दुल्ला और स्वामी अय्यंगर की जोड़ी ही थी। इन सभी ने मिलकर धारा ३७० को अंतिम रूप दिया। हालांकि इस मसौदे का धारदार और हिंसक विरोध हुआ। इस मसौदे पर हस्ताक्षर करने के बाद वो अमेरिका में थे। सरदार पटेल नहीं चाहते थे कि कोई भी कदम नेहरू जी की अनुपस्थिति में कोई भी अपमानजनक कार्य न हो जिससे नेहरू जी को बुरा लगे। शेख की महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गई कि वह कश्मीर पर बिना किसी की नियंत्रण के अधीन हुए राज्य करना चाहता था।

अब यह बात आती है कि आखिर अनुच्छेद ३७० इतनी विवादित क्यों था । अनुच्छेद ३७० के अनुसार कुछ मामले जो कश्मीर विलय के समय भारत के साथ समाहित हो गए थे उनको छोड़कर भारत की संसद कोई आदेश कश्मीर पर नहीं लागू हो सकता था, इसमें कोई भी संशोधन या आदेश राष्ट्रपति द्वारा कश्मीर की मुखिया की सहमति पर ही संभव था। इसके अंतर्गत बहुसंख्यक मुसलमानों को बहुसंख्यक ही रखने की व्यवस्था थी । यहां भारत का कोई नागरिक स्थाई तौर पर नहीं रह सकता था, भारत का कोई भी नागरिक किसी तरह की अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता था, भारत का कोई भी नागरिक किसी भी तरह का  व्यापार भी नहीं कर सकता था । इन सब विसंगतियों के बीच यह भी याद रखने योग्य है कि डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दो प्रधान, दो विधान और दो निशान का विरोध किया था । शेख अब्दुल्ला अपने कुटिल स्वभाव के वश पंडित नेहरू को हमेशा भ्रम और धोखे में रखते थे। पंडित नेहरू इन की कुटिलता को देखने में पूर्णत: विफल थे। यहां एक बात का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि शेख के करीबी बख्शी ने नेहरू जी को बताया कि उनकी भेजें हथियार संघ को दिए जा रहे हैं । पंडित नेहरू ने संघ पर लांछन लगाते हुए सरदार पटेल को पत्र भी लिख दिया। सरदार पटेल ने जांच कराने के बाद नेहरू जी को पत्र लिख सभी बातो को भ्रांति एवं सफेद झूठ करार दिया। माउंटबेटन तथा चर्चिल हमेशा से कश्मीर को पाकिस्तान के साथ जोड़ने की इच्छा रखते थे। चर्चिल के भारत विरोधी बयान इसके प्रमाण भी है। सरदार पटेल ने चर्चिल को बड़े कड़े शब्दों में जवाब दिया था। बाद में उस अनुच्छेद को भारत को स्वीकार करना पड़ा। यह सिर्फ भारत के कुछ अति महत्वाकांक्षी एवं अदूरदर्शी नेताओं की वजह से हुआ । 5 अगस्त 2019 को भारत की मौजूदा सरकार ने अनुच्छेद ३७० (खंड एक को छोड़कर) समाप्त कर दिया । इसकी जगह अब दो नए राज्य जो कि केंद्र शासित प्रदेश होंगे का गठन हुआ । यह दो नए केंद्र शासित प्रदेश है जम्मू कश्मीर और लद्दाख। इन दोनों जगहों विधानसभा नहीं होगी । अब भारत का संविधान यहां पूर्ण रूप से लागू होगा । केवल भारतीय ध्वज इन दोनों राज्यों में स्वीकार्य होगा । भारत सरकार की समस्त योजनाओं का लाभ भी अब इन दोनों प्रदेशों के लोगों को मिल सकेगा । भारत के गृह मंत्री ने स्पष्ट रूप से यह कहा है की पीओके तथा गिलगित और बाल्टिस्तान भी इन्ही राज्यों के अंग है । उम्मीद है आने वाले समय में दोनों राज्य विकास शांति एवं सद्भाव के नए अध्याय लिखेंगे । एक अत्यंत साहस एवं दृढ़ फैसले को पूरे विश्व में जैसे सम्मान दिया गया है। यह सरकार के दृढ़ इरादों को और मजबूत करता है। आजादी के सात दशक बाद पहली बार २ परिवारों की जागीर से मुक्त हुआ ये भू भाग अपने आप को अब स्वतंत्र महसूस कर रहा है। सरकार के इस कदम से न सिर्फ अलगाववादियों की राजनीती समाप्त हो जाएगी बल्कि पाक समर्थित लोगो की जीवनी भी समाप्त हो जाएगी । जिस प्रकार से ऑपरेशन आल आउट ने काम किया है अगर इसकी यही रफ़्तार रही तो वो दिन दूर नहीं जब यह हिस्सा फिर से स्वर्ग सामान हो जायेगा |

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