चीन, ताइवान और हांगकांग समस्या

मानव इतिहास की लगभग सभी सभ्यताएं चाहे प्राचीन हो या नवीन कुछ विशेष आदर्शों, दर्शन व विचारधारा के अंतर्गत पुष्पित व पल्लवित होती हैं।  भारतीय सभ्यता वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत को आत्मसात किए हुए हैं।  अतः भारत का किसी अन्य राष्ट्र पर साम्राज्यवाद का प्रमाण इतिहास में उपलब्ध नहीं है। यूरोपीय सभ्यता ‘वाइट मैन्स बर्डन‘ (गोरे व्यक्तियों की जिम्मेदारी) के सिद्धांत को मानती है, जो अरस्तु जैसे विचारकों की विचारधारा से प्रभावित हैं।  उनका यह विचार है कि सभी श्वेत नस्ल (यूरोपीय नस्ल) के लोग सभ्य हैं और उनका यह नैतिक कर्तव्य है कि वे असभ्य लोगों मुख्यतः अफ्रीकी व एशियाई लोगों को सभ्य बनाएं। अतः उन्होंने उपनिवेशवाद का समर्थन किया और साम्राज्य विस्तार किया।  आधुनिक मानव सभ्यता जैसे अमेरिकी सभ्यता स्वयं को मानवाधिकार, स्वतंत्रता और समानता व उदारीकरण का अग्रदूत मानती है और अपनी नीतियों को उसी अनुरूप तय करती हैं। उपरोक्त उदाहरणों से यह बात निकलकर आती है कि अपने दर्शन व विचारधारा का प्रयोग सभी सभ्यताएं अपने हितों की रक्षा व प्रसार हेतु करती हैं। चीन भी विश्व की महानतम सभ्यताओं में से एक है। चीन भी एक विशेष विचारधारा की जटिलता से ग्रसित है। आधुनिक चीन की नीतियों को निर्धारित करने में यह जटिलता अपना विशेष योगदान रखती है।  चीन अपनी प्राचीन संस्कृति को अपना गौरव समझता है और कई टुकड़ों में बटे हुए चीन के हिस्सों का पुनः चीनीकरण करना चाहता है।  यद्यपि चीन एक साम्यवादी राष्ट्र है और साम्यवादी राष्ट्रों में धर्म की महत्ता बहुत कम ही देखी जाती है। मार्क्स ने धर्म को ‘‘जन समूह का अफीम’’ कहा था।  चीन में धर्म, विशेष रूप से इस्लाम के प्रति यह भावना अत्यधिक प्रभावी है।



शिंजियांग प्रांत के उईगर मुस्लिमः

उईगर मुस्लिम चीन के पश्चिमी प्रांत शिंजियांग के निवासी हैं।  1.2 करोड़ आबादी वाला यह जनसमूह मूल रूप से तुर्की है, जो कि चीन का पांचवा सर्वाधिक नस्लीय समुदाय है।  सभ्यताओं का टकराव मतभेद का कारण बन सकते हैं।  चीन पूरी चीनी आबादी को एक ही रंग में रंगना चाहता है, जिससे अपने ‘मिडिल स्टेट्स कान्सेप्ट’ को बनाया रहा जा सके।  चीन ने इसके विधिवत उपाय किए हैं।  विश्व के 26 देशों की सूची बनाई है और उन देशों में उईगर मुस्लिमों की गतिविधियों पर नजर रखी।  पूरी उईगर आबादी के डी0एन0ए0 तथा बायोमेट्रिक सैंपल लिए गए और उनका आधिकारिक संरक्षण कर नजर रखी गई। किसी भी सभ्य राष्ट्र की महानता उसकी अपने नागरिकों की निजता के अधिकार के सामर्थ्य के अनुक्रमानुपाती होती है। सभ्यता के सभी मानकों को तार-तार करते हुए चीन ने शिंजियांग प्रांत में डिटेंशन कैंप (बन्दीगृह) बनाए।  10 लाख से ज्यादा उईगर मुस्लिमों को वोकेशनल ट्रेनिंग के नाम पर जबरन बंद कर दिया गया।  चीन ने इसे तीन दुष्ट शक्तियों आतंकवाद, अलगाववाद व अतिवाद के विरुद्ध एक युद्ध करार दिया। चीन ने इतिहास से भी कुछ उदाहरण लिए।  हिटलर अपने पक्ष को प्रचारित करने के लिए प्रचार मंत्री (प्रोपेगेंडा मिनिस्टर) रखता था।  चीन ने इस व्यवस्था को एक नया आयाम दिया। कई संग्रहालय खोलें और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को बुलावा भेजा।  इन संग्रहालयों में उईगर मुस्लिमों के आतंक से संबंधित साक्ष्य प्रस्तुत किए।  जिससे चीन की साख व उसका पक्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत रहे।  हालांकि सत्य इसके विपरीत है।  चीन में उईगर मुस्लिम न तो दाढ़ी रख सकते हैं और न ही रोजा रख सकते हैं। रोजा रखते हुए पकड़े जाने पर डिटेंशन कैंप में डाल दिया जाता है, जहां शारीरिक मानसिक प्रताड़ना झेलना पड़ता है। वास्तव में इन डिटेंशन कैंप में मंदारिन भाषा व चीनी संस्कृति को जबरन पढ़ाया जाता है। उईगर मुस्लिमों को अपने धर्म व आस्था को त्यागने पर मजबूर किया जाता है। चीन में प्राइवेट मीडिया पर पाबंदी है और सरकारी मीडिया केवल सरकार का ही पक्ष दिखाती है। चीन में एक संवैधानिक विडंबना यह भी है चीनी नागरिकों हेतु मूल अधिकारों की सूची बहुत लंबी है, लेकिन उन अधिकारों के हनन के विरुद्ध न्यायालय जाने का कोई अधिकार नहीं है, मिश्र व तुर्की जैसे देश जो संसार में मुस्लिमों के अधिकार के लिए आवाज उठाने वालों में जाने जाते हैं, किंतु चीनी आर्थिक संबंधों ने उनका भी मुंह बंद कर रखा है। संयुक्त राष्ट्र संघ भी इस अमानवीय कृत्य पर चुप्पी साधे बैठा है।  अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस विषय पर ध्यान देकर इस को चीन के विरूद्ध उठाना चाहिए।  कश्मीर के मुद्दे पर हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन ने अनौपचारिक अधिवेशन बुलाया था और कश्मीरियों की स्थिति पर चर्चा की थी। शिंजियांग प्रांत की समस्या भारत को विरोध दर्ज कराने का एक मजबूत विकल्प देती है। भारत में शिंजियांग पर चर्चा होनी चाहिए ताकि चीन को यह संदेश दिया जा सके कि मानवाधिकार व आतंकवाद पर दोहरा चरित्र उचित नहीं है।  वोकेशनल ट्रेनिंग की आंड़ में उईगर मुस्लिमों पर अत्याचार, उनके मानवाधिकारों का हनन व धार्मिक स्वतंत्रता पर अवरोध यह चीन की कमजोरियों में से एक है। भारत जैसे राष्ट्र को इस कमजोरी को कश्मीर के मसले पर चीन के साथ ‘बार्गेनिंग चिप’ की तरह प्रयोग करना चाहिए।





ताइवान के संदर्भ में

द्वितीय विश्व युद्ध के समय ताइवान जापान का एक हिस्सा था। युद्ध समाप्त होने पर ताइवान स्वतंत्र हुआ। सन् 1949 के चीन की साम्यवादी क्रांति ने गृह युद्ध को जन्म दिया और अंततः दो नई सरकारे बनी।  रिपब्लिक ऑफ चाइना (ताइवान) तथा द पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (चीन)।  यद्यपि चीन ने कभी भी ताइवान की उस सरकार को मान्यता नहीं दिया और ताइवान को चीन का ही एक अंग माना।  ताइवान के संदर्भ में चीन की विदेश नीति के 2 अवयव हैं।  पहला है- ‘‘एक चीन का सिद्धांत’’ व दूसरा है-‘‘एक चीन की नीति’’।  ‘एक चीन के सिद्धांत’ के अंतर्गत कोई भी राष्ट्र जो चीन के साथ राजनैतिक संबंध चाहता है उसे यह स्वीकार करना होगा कि चीन एक ही है और ताइवान चीन का अभिन्न अंग है। ‘एक चीन की नीति’ के अंतर्गत यदि कोई राष्ट्र चीन के साथ सभी राजनीतिक संबंध रखता है तो उसे ताइवान के साथ सभी राजनीतिक संबंध समाप्त करने होंगे।  अमेरिका ने सन् 1972 में एक चीन नीति का अनुसरण किया।  भारत के भी ताइवान के साथ सीधे राजनीतिक संबंध नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अर्थव्यवस्था व आर्थिक संबंधों का विशेष योगदान होता है। ताइवान एक पूंजीवादी व्यवस्था को स्वीकार करता है, वहीं चीन एक साम्यवादी व्यवस्था को।  ताइवान व अमेरिका के आर्थिक व रक्षा संबंध बहुत मजबूत हैं। मानचित्र में सूक्ष्म से दिखने वाले ताइवान ने सन् 2015 में 34 बिलियन डालर का निर्यात अमेरिका को किया।  वहीं अमेरिका ने भी रक्षा निर्यात (जिसमें एफ-16 प्रमुख है) ताइवान के साथ किया।  यह मजबूत संबंध सदैव चीन की आंख में काटें की तरह चुभता रहा है। रक्षा आपूर्ति अमेरिका के पक्ष में है, लेकिन चीन इसे ‘एक चीन की नीति‘ का उल्लंघन मानता है। अमेरिका ने शीत युद्ध के आरंभ से ही ताइवान के साथ अच्छे संबंध रखें। जिससे साम्यवादी चीन पर अंकुश लगा रहे, अमेरिका की यही नीति सदैव चीन को सन्देहग्रस्त रखती है। वर्तमान ट्रेड वार ने इस विवाद में एक नई जान फूंक दी है।  चीन किसी भी कीमत पर ताइवान का पूर्ण विलय चाहता है, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन के ट्रेड टैरिफ के बढ़ने से ‘एक चीन की नीति’ पर पुनर्विचार की मांग की है। यहां यह बात ध्यान देने की है कि कोई भी कदम क्षेत्रीय शांति भंग करने वाला नहीं होना चाहिए। चीन व अमेरिका के आपसी सामंजस्य का अभाव भविष्य में नये शीत युद्ध को एक नया आयाम दे सकती है।  भारत के चीन, अमेरिका, ताइवान सभी के साथ अच्छे आर्थिक संबंध है।  किसी भी तरह की अस्थिरता भारत को भी प्रभावित करेगी। भारतीय नीति निर्माताओं को यह प्रयास करना चाहिए कि एक सकारात्मक मार्ग का निर्माण किया जाए और बिना चीन अथवा अमेरिकी दबाव में एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया जाए।  भारत एक क्षेत्रीय महाशक्ति है किसी विशेष पक्ष को समर्थन देने की बजाय सभी पक्षों के तटस्थ रहना ही भारतीय हित में है।



हांगकांग के संदर्भ में

हांगकांग 1994 से चीन की संप्रभुत्व में एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र है। इसे अपनी स्वायत्तता भी प्राप्त है। इससे पहले यह ब्रिटिश साम्राज्य का एक हिस्सा था। जिसे ब्रिटेन ने विशेष शर्तों के साथ चीन को सौंप दिया था। घोषणा पत्र में चीन ने यह स्वीकार किया था कि अगले 50 वर्षों तक हांगकांग में साम्यवादी व्यवस्था लागू नहीं होगी और पूंजी व्यवस्था ही बरकरार रहेगी। इसके अतिरिक्त हांगकांग की स्वायत्तता का भी ध्यान रखा जाएगा। यह ‘एक राज्य दो व्यवस्था’ वर्षों से प्रचलन में थी।  किंतु विगत कुछ वर्षों में कुछ घटनाओं ने नई चुनौतियों को जन्म दे दिया। सन् 2018 में एक हांगकांग के युवक ने एक युवती की ताइवान में हत्या कर दी।  हांगकांग का ताइवान से कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं है। क्योंकि सन्धि संप्रभु इकाइयों के बीच होती है, किंतु चीन ताईवान की संप्रभुता को स्वीकार नहीं करता।  अतः सरकार ने एक संशोधन विधेयक प्रस्ताव किया, जिसमें यह व्यवस्था थी कि मुख्य कार्यकारी के आदेश पर ऐसे भगोड़े व्यक्तिय को ‘केस बाई केस बेसिस’ पर चीन की किसी भी न्याय व्यवस्था में दंडित किया जा सके।  मुख्य चीन की न्याय व्यवस्था भी इस विधेयक में सम्मिलित थी।  हांगकांग के लोगों की इस विषय पर आपत्ति थी कि हांगकांग  की स्वायत्तता में दखल है।  उनका कहना था कि हांगकांग सरकार चीन की न्याय व्यवस्था को सम्मिलित न करके सीधे ताइवान से प्रत्यर्पण संधि करें। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वे अपने प्रशासनिक स्वायत्तता को बरकरार रखना चाहते थे। चीन की सरकार ने विरोधियों पर अपना दबाव बढ़ाना प्रारंभ किया।  धरने प्रदर्शन इतने बड़े स्तर पर हुए कि जानमाल का काफी नुकसान हुआ। अन्ततोगत्वा इस विधेयक को वापस लेना पड़ा।  यह अवरोध एक और विशेष कारण से चर्चा में आया।   चीन की सरकार नें विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए आधुनिक जासूसी यंत्रों व हथियारों का प्रयोग किया।  हांगकांग निवासियों ने पुलिस से भी अधिक आधुनिक उपाय किए। उदाहरण के तौर पर लेजर प्रकाश का प्रयोग करके पुलिस के कैमरे को खराब कर देना, चेहरे की पहचान छुपाने के लिए आधुनिक मास्क, संचार व सोशल मीडिया बंद होने पर अपने व्यक्तिगत  एप्लीकेशन बना लिए।  मानव इतिहास में एक नए विरोध तरीके को दर्ज किया गया। जहां सैन्य बल और पुलिस बल तकनीकी बल के आगे नतमस्तक नजर आया। दूसरे शब्दों में कहें तो हांगकांग निवासियों का अनुशासन व तकनीकी से भरे विरोध प्रदर्शन के आगे चीन घुटने टेकते नजर आया। इस घटना से भारत भी दो सीख ले सकता है। पहली यह कि क्षेत्रीय स्वायत्तता के साथ छेड़छाड़ करने के पहले एक व्यापक व पूर्णतावादी योजना बनाना होगा।  लोगों की जमीन जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण उनका हृदय जीतना होगा।  जनजाति क्षेत्रों व विशेष राज्यों के जैसी व्यवस्था भारत में भी है। दूसरा यह कि अब विरोध प्रदर्शन के तरीके आधुनिक हो चले हैं अतः पुलिस बल को नए सिरे से प्रशिक्षित व नए मानकों के स्तर पर तैयार करना होगा। एक आधुनिक व व्यापक सोच आधुनिक भारत के हित में है। 

निःसंदेह चीन की सभ्यता विश्व की महानतम सभ्यताओं में से एक है और चीन को इस गौरवशाली सभ्यता के पुनरुत्थान का, संरक्षण का संपूर्ण अधिकार प्राप्त है।  किंतु चीनी नीति निर्माताओं को यह समझने की आवश्यकता है कि बाहुबल या सैन्य क्षमता विपक्षी के सैन्य क्षमता से लड़ सकती है, किंतु किसी विचारधारा से नहीं।  विचारधारा को विचारधारा ही परास्त कर सकती है।  विचारों के संग्राम में सदैव किसी विचारधारा की ही जय होती है और घृणा जन्म नहीं लेती है। क्योंकि श्रेष्ठतम विचार अंत में सर्वमान्य होता है। जबकि बल प्रयोग से मिलने वाली विजय अपने साथ घृणा को भी जीवित रखती है। अतः वह विजय अस्थाई शांति को ही स्थापित कर सकती है। शिंजियांग प्रांत में इस्लाम ने, ताइवान में स्वायत्तता ने, व हांगकांग में आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों ने, लोगों के विचारों को आयाम दिया है।  यह विचारधाराएं उनके जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुकी हैं, अतः उनका सम्मान होना चाहिए।



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