सीडीएस- अब एक सेनापति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में पहली दफा और लगातार छठी बार लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश को संबोधित करते हुए जो बड़ी घोषणाएं कीं, उनमें से एक है चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित करने की घोषणा, सीडीएस तीनों सेनाओं के बीच आपसी तालमेल को बेहतर करने का काम करेगा। सेना में इसकी मांग बहुत पहले से की जा रही थी। पंडित नेहरू १९६२ के चीन युद्ध से पहले देश में सीडीएस बनाना चाहते थे पर तत्कालीन रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन के विरोध से पीछे हट गए थे।

लाल किला भारत की सैन्य शक्ति का शानदार प्रतीक भी है और बदलाव की तारीख भी। यह मुगल और ब्रिटिश दो साम्राज्यों की ताकतवर राजगद्दी हुआ करता था और इसी किले की प्राचीर से भारत ने दुनिया के सामने ऐलान किया कि वह स्वतंत्र गणराज्य बन गया है। इसी किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ७२ साल में भारत के सबसे अहम रक्षा सुधार का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि सीडीएस सरकार के एकल सैन्य सलाहकार होंगे, जो ”रक्षा बलों के बीच तालमेल को और तेज” करेंगे और इसे ”और ज्यादा असरदार” बनाएंगे। यहां तक कि जिस सरकार ने दुराव-छिपाव, गोपनीयता और अचंभे को अपनी पहचान बना लिया है, उस लिहाज से भी यह ऐलान निहायत हैरान करने वाला था। ब्रिटिश राज के दिनों से तकरीबन बगैर किसी बदलाव के काम करते आ रहे विशालकाय रक्षा मंत्रालय के भीतर भी बहुत कम लोगों को पता था कि ऐसा होने जा रहा है। 

 भारत में सीडीएस का काम चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (सीओएससी) के चेयरमैन के जिम्मे है। इस पद पर तीनों सेना प्रमुखों में जो सबसे वरिष्ठ होता है उसकी नियुक्ति की जाती है। वर्तमान में वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ इस पर कार्यरत हैं। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सीडीएस की नियुक्ति को लेकर कार्य शुरू हुआ था। लेकिन, कोई फैसला नहीं हो सका था। उस समय सरकार ने शेकटकर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद इस पर फैसला लेने की बात कही थी। प्रधानमंत्री ने यह ऐलान ऐसे वक्त किया है जब देश का राष्ट्रीय सुरक्षा फलक एक मोड़ से गुजर रहा है। राजनैतिक नेतृत्व के सेना को देखने के तरीके में जबरदस्त बदलाव आया है। इसे अब परमाणु शस्त्र संपन्न पाकिस्तान के खिलाफ कठोर शक्ति का ताकतवर औजार समझा जाता है। पूर्व की सरकारों ने पाकिस्तान के परमाणु असलहा के मद्देनजर २००१ में संसद पर हुए हमले और २६/११ के मुंबई आतंकी हमले का बदला लेने से परहेज किया था। पर प्रधानमंत्री मोदी ने परमाणु छतरी के रहते भी सैन्य टकराव की गुंजाइश को हरी झंडी दिखाई है। उड़ी और पुलवामा के आतंकी हमलों के जवाब में सीमा पार कमांडो कार्रवाई और पाकिस्तान के भीतर आतंकी प्रशिक्षण शिविरों पर बमबारी की गई। इससे सिद्ध होता है कि प्रधानमंत्री मोदी कड़े कदम उठाने से पीछे कभी भी नहीं हटते। 

प्रधानमंत्री मोदी ने दिसंबर २०१५ में संयुक्त कमांडरों की कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सीडीएस की तरफ इशारा किया था। तब उन्होंने कहा था कि ”शीर्ष पर जुड़ाव की जरूरत बहुत लंबे वक्त से है।” इस जरूरत को पूरा करने में उन्हें तकरीबन चार साल लगे। 

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस तीनों सेनाओं में सबसे वरिष्ठ होगा। वह रक्षा योजनाओं और प्रबंधन पर सरकार को सलाह देगा। सीडीएस की नियुक्ति के बाद डिफेंस प्लान में तीनों सेनाओं के बीच प्राथमिकता तय करना आसान होगा। जैसे- बजट में किस पर ज्यादा खर्च करना है, किसे उपकरण खरीद करना है इत्यादि। इससे तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बेहतर होगा। तीनों सेनाओं की उपयोगिता कहां और कैसे करनी है इस पर भी प्रभावी फैसला लिया जा सकेगा। इसके अलावा सीडीएस एनएसए और खुफिया प्रमुखों के साथ तालमेल को भी बेहतर ढंग से क्रियान्वित कर सकेगा। सीडीएस की नियुक्ति से युद्ध के समय सिंगल प्वॉइंट आदेश जारी किया जा सकेगा, जिसका मतलब तीनों सेनओं को एक ही जगह से आदेश जारी होगा। जिससे सेना की रणनीति पहले से अधिक प्रभावशाली हो जाएगी, और कोई कन्फयूजन की कोई स्थिति नहीं होगी। इससे काफी हद तक हम अपना नुकसान होने से बचा पाएंगे।

बहरहाल,  रक्षामंत्रालय ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस की नियुक्ति का मसौदा तय करने के लिए चार सदस्यीय समिति का गठन कर दिया है। इस समिति को ९० दिन में अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी। इसमें रक्षा सचिव और चीफ ऑफ इंटिग्रेटिज डिफेंस स्टाफ टू द चेयरमैन , चीफ्स ऑफ स्टाफ  समिति यानि (सीआईएससी) के अलावा दो और सदस्य हैं। यह समिति सीडीएस की भूमिका, दायित्व और शक्तियों के बारे में रूपरेखा तय करेगी। 

यह कदम हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को ज्यादा प्रभावी और अधिक किफायती बनाएगा। यह बेहतर संयोजन और बहुपक्षीय समन्वय सुनिश्चित करेगा। लेकिन ये बहुत कम लोगों को ध्यान में है कि आज से सैंतालिस साल पहले सीडीएस की नियुक्ति होते-होते रह गई थी। १९७१ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तय कर लिया था कि देश में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के तौर पर एक नए पद का निर्माण कर इस पर तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशॉ को बिठा दिया जाए। लेकिन ऐसा हो न सका और जनरल मानेकशॉ को आखिरकार देश के पहले फील्ड मार्शल से ही संतोष करना पड़ा। इस तरह वो देश के पहले फाइव स्टार जनरल बने। दरअसल आम तौर पर सेना के तीनों अंगों के प्रमुख ही अपनी गाड़ियों पर चार सितारे यानी फोर स्टार लगाते हैं, जबकि फील्ड मार्शल को अपनी गाड़ियों पर पांच सितारे यानी फाइव स्टार लगाने की इजाजत होती है और इसीलिए फील्ड मार्शल को फाइव स्टार जनरल भी कहा जाता है। 

दिसंबर १९७१ के भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश के उद्भव के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सैम मानेकशॉ को न सिर्फ देश का पहला फील्ड मार्शल बल्कि देश का पहला चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ भी बनाना चाह रही थीं। उनकी इस योजना के मुताबिक केंद्र सरकार में फाइल चलनी भी शुरू हुई। लेकिन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को ये योजना पसंद नहीं आई, जो देश की नौकरशाही की अगुआई करते हैं। उनको ये डर था कि अगर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित हो गया और जनरल सैम मानेकाशॉ जैसा सैन्य अधिकारी इस पद पर बैठ गया, तो सुरक्षा मामलों में बाबुओं की चलनी एकदम बंद हो जाएगी और रक्षा मंत्रालय के मामलों में भी जो उनका एकाधिकार है, उसमें कटौती आ जाएगी और रक्षा मंत्रालय से जुड़े ज्यादातर काम सीडीएस के पास चले जाएंगे, क्योंकि वो रक्षा मंत्रालय के अंदर सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी बन जाएगा। नौकरशाहों को ये टीस तो हमेशा रहती ही है कि सेना के तीनों अंगों के प्रमुख रक्षा सचिव को रिपोर्ट करने की जगह रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करते हैं और ऐसे में सीडीएस अगर मैदान में आ गया, तो उनकी रही-सही पूछ और रक्षा मामले में दखलंदाजी काफी हद तक बंद हो जाएगी। यही वजह रही कि इंदिरा गांधी की योजना के सामने आने के बाद नौकरशाहों ने सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों में ही फूट डालनी शुरू कर दी। थल सेना के प्रमुख तो खुद जनरल मानेकशॉ ही थे। ऐसे में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल पीसी लाल और नौ सेना प्रमुख एडमिरल एसएम नंदा को नौकरशाहों ने चढ़ाना शुरू कर दिया। पहले तो ये कहकर कि पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में तीनों ही सेनाओं का बड़ा योगदान रहा है, फिर जनरल मानकेशॉ को ही क्यों फील्ड मार्शल बनाया जाए और दूसरा ये कि अगर मानेकशॉ फील्ड मार्शल के साथ-साथ चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ भी बन गए, तो थल सेना के मुकाबले वायुसेना और नौ सेना का आकार वैसे ही छोटा है, उनकी पूछ भी एकदम कम हो जाएगी और थल सेना का दबदबा और बढ़ जाएगा।  

इन बातों से साफ़ पता चलता है कि किसी भी कार्य को सफलता पूर्वक करने के लिए साफ़ नियत के साथ साथ कठोर कदम उठाने की इक्षाशक्ति भी होनी चाहिए, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी नहीं दिखा पाई। 

 तत्पश्चात सीडीएस बनाने की मांग साल १९९९ में हुए कारगिल युद्ध के बाद बनी कारगिल रिव्यू कमेटी ने भी किया था। लेकिन सरकारी प्रयास के अभाव में लगभग २० साल के यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ था। कारगिल समीक्षा समिति की वो अनुशंसा आखिरकार वास्तविकता के धरातल पर उतरने जा रही है, क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से इसकी घोषणा कर दी है। इस बात की कम से कम अब आशंका नहीं है कि कोई नौकरशाह या फिर कोई और नेता प्रधानमंत्री मोदी की इस घोषणा की राह में आड़े आए। ये दौर पहले का नहीं है, जब नौकरशाह देश के प्रधानमंत्री की इच्छा को भी दबा देते थे। ये वो दौर है, जब प्रधानमंत्री के आदेश का पालन करने से हिचकने में किसी आईएएस अधिकारी की हिम्मत नहीं हो सकती। देश को पहला सीडीएस देने का श्रेय आजादी के करीब ७२ साल बाद पीएम मोदी के खाते में जाएगा। भारतीय सेना और उसके अधिकारियों के लिए ये देर आया, पर दुरुस्त आया जैसी बात ही होगी। अगर उनके लिए कुछ बचा है तो बस कुछ दिनों का इंतजार, क्योंकि मोदी अपने दूसरे कार्यकाल में फैसले लेने में महीनों का समय नहीं लगा रहे, महज कुछ दिनों में आर्टिकल ३७० की समाप्ति से लेकर तीन तलाक जैसे बिल को पास कराने का हौसला दिखा रहे हैं। देहांत के ११ साल बाद सैम बहादुर की आत्मा भी प्रसन्न होगी कि वो न सही, तो कम से कम प्राणों से प्रिय उनकी सेना का कोई अधिकारी आखिरकार सीडीएस की कुर्सी पर बैठने जा रहा है। 

भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न सीडीएस की वैधानिक स्थिति और प्रोटोकॉल को लेकर था। मौजूद तीनों जनरल चार स्टार और रक्षा सचिव के समकक्ष हैं। ऐसे में सीडीएस को क्या रैंक और प्रोटोकॉल दिया जाए इसको लेकर कई मतभेद हैं। अभी अमेरिका,चीन, यूनाइटेड किंगडम जापान के साथ-साथ कई और देशों के पास चीफ ऑफ डिफेंस का पद है। राष्ट्र सुरक्षा के सभी मामलों से सीमित संसाधनों से साथ निपटने के लिए चीफ ऑफ डिफेंस के पद की बहुत जरूरत थी। चीफ स्टाफ कमेटी में थलसेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुख शामिल होते है। कमेटी के सबसे वरिष्ठ सदस्य को इसका चेयरमैन नियुक्त किया जाता है।

अगर अमेरिका की बात करें तो यूएस में ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (सीजेसीएससी) का चेयरमैन का पद हमारे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के बराबर का पद है। यह अमेरिकी सरकार को सेना से समस्त गतिविधियों की जानकारी देने के साथ सेना और सरकार के बीच तालमेल का काम करता है। वर्तमान में जनरल जोसेफ डनफोर्ड ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (सीजेसीएससी) के चेयरमैन हैं।

वही ब्रिटेन में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ तीनों सेनाओं का प्रमुख होता है जो रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री का प्रमुख सुरक्षा सलाहकार भी होता है। वर्तमान में इस पद पर जनरल सर निक कार्टर चीफ हैं। 

और अगर चीन की बात करें तो वहां की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की देखरेख ज्वाइंट स्टाफ डिपार्टमेंट ऑफ द सेंट्रल मिलिट्री कमीशन करता है। इस डिपार्टमेंट को कमांड सेंट्रल मिलिट्री कमीशन द्वारा मिलता है। जिसके वर्तमान में प्रमुख जनरल ली जोउचेंग हैं।  बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी सदैव अटल स्मारक को प्रेरणा और ऊर्जा का केंद्र भी मानते हैं। लोकसभा चुनावों में भारी विजय हासिल करने के बाद मोदी नयी सरकार के गठन से पहले सभी भाजपा सांसदों के साथ यहाँ आये थे। प्रधानमंत्री ने १५ अगस्त को लाल किले की प्राचीर से जो घोषणाएं कीं उनमें प्रमुख घोषणा है चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित करने की। यह सपना अटलजी का था जिसे मोदी पूरा करने जा रहे हैं। जनसंघ और भाजपा नेताओं ने कश्मीर से अनुच्छेद ३७० और ३५ए हटाने का भी सपना देखा था जिसे हाल ही में सरकार ने साकार किया है।

About धीरज कुमार

View all posts by धीरज कुमार →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *