अखंड भारत की सीमाएँ व लुप्त भूभाग

आज हमारे पास जम्मू-कश्मीर राज्य में 740 किलोमीटर लंबी ‘नियंत्रण रेखा’ है, जो विवादित है। जमीन पर रेखा चिन्हित नहीं है; हालाँकि, इसे मानचित्र पर चित्रित किया गया है, जो दोनों देशों के प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षरित है। ‘पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर’ की 78,114 वर्ग किलोमीटर जगह पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। इसके अलावा, पाकिस्तान पूरे राज्य पर दावा कर रहा है और राज्य में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। उसने विवादित राज्य को लेकर भारत के खिलाफ तीन युद्ध छेड़े थे।

मौर्य काल के दौरान चाणक्य अपने समय के सबसे महान रणनीतिक विचारकों में से एक थे। अपने संरक्षण में, चंद्रगुप्त मौर्य ने भारतवर्ष के सबसे महान साम्राज्यों में से एक की स्थापना की। उस समय यह दुनिया का सबसे मजबूत साम्राज्य था। चंद्रगुप्त की सेना में 600,000 पैदल, 30,000 घुड़सवार, 8000 रथ और 9000 हाथी थे। उन्होंने सेल्यूकस निकेटर को हराया; जो सिकंदर का एक जनरल था और जो मध्य पूर्व पर शासन कर रहा था। मौर्य साम्राज्य का क्षेत्रफल 5 मिलियन वर्ग किलोमीटर था, जब कि आधुनिक भारत का क्षेत्रफल केवल 3.2 मिलियन वर्ग किलोमीटर है। शासनकला पर उनकी पुस्तक, ‘अर्थशास्त्र’ एक सबसे बड़ा शोध-ग्रंथ है, जिसे आज भी रणनीतिकार और राजनेता पढ़ते हैं। हालाँकि, दो हज़ार वर्षों में, हमने अपनी सामरिक दृष्टि और राजनीतिक शासन-कला को इतना गिरा दिया कि हम बाहरी लोगों द्वारा सात शताब्दियों से भी अधिक की अवधि में उनके वशीभूत रहे । स्वतंत्र भारत कोई बेहतर नहीं था, क्योंकि हमने अपनी अयोग्यता के कारण क्षेत्रों को खो दिया ।

हमारी उत्तरी सीमाओं की ओर देखते हुए, 4056 किलोमीटर लंबाई की संपूर्ण चीन-भारतीय सीमा विवाद में है और इसे ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ भी कहा जाता है। इसके अलावा, अरुणाचल प्रदेश राज्य का 90,000 वर्ग किलोमीटर का दावा भी चीन अपने क्षेत्र के रूप में कर रहा है और इसे उसने ‘दक्षिणी तिब्बत’ की संज्ञा दी है। अंग्रेजों के समय में इनमें से कोई भी समस्या मौजूद नहीं थी और ये सभी स्वतंत्रता के बाद हमारी सीमाओं को रणनीतिक रूप से हमारे द्वारा प्रबंधित करने में असमर्थता के कारण पैदा हुईं। इसके अलावा हमारे ये दोनों विरोधी ‘न्यूक्लियर और मिसाइल पॉवर्स’ हैं और दोनों के लिए भारत एक समान दुश्मन है। पाकिस्तान और चीन ने भारत के खिलाफ एक धुरी बनाई है और भविष्य का कोई भी युद्ध, भारत के लिए ‘दो मोर्चा युद्ध’ होगा, पश्चिम की ओर से पाकिस्तान और उत्तर की ओर से चीन । इस लेख में, मैं चीन-भारतीय सीमाओं के बारे में बताउँगा और जम्मू व कश्मीर की उलझन के बारे में संक्षिप्त जानकारी भी दूँगा ।

मैककार्टनी और मैकडॉनल्ड रेखा

19 वीं शताब्दी के मध्य में, जनरल जोरावर सिंह, जो सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह के एक डोगरा जनरल थे, वे एक युद्ध अभियान पर गए थे और उसमें लद्दाख, बाल्टिस्तान, स्कार्दू को शामिल किया था और तक्क्लकोट तक गए थे, जहाँ उन्होंने तोयो के युद्ध में दिसम्बर 1841 में अपनी जान गंवा दी । सितंबर 1842 की चुशुल की संधि द्वारा, लद्दाख सिख साम्राज्य का एक हिस्सा बन गया। संयोग से, यह संधि एक त्रिपक्षीय संधि थी, जिस पर महाराजा गुलाब सिंह ने सिख साम्राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए और अधिकारी ने चीनी सम्राट और तिब्बत के लामा गुरु की ओर से हस्ताक्षर किए थे। बाद में अंग्रेजों ने लद्दाख क्षेत्र में भारत-तिब्बत सीमा को औपचारिक रूप देने के लिए कई रेखाएँ खींचीं: जैसे 1865 की जॉनसन रेखा और 1899 की मैककार्टनी और मैकडॉनल्ड रेखा । स्वतंत्रता के बाद, जॉनसन रेखा को भारतीय गणराज्य की वैध सीमा के रूप में मान्यता दी गई । 

हमारी उत्तर पूर्वी सीमाओं को मैकमोहन रेखा द्वारा अच्छी तरह से व्याख्यायित किया गया था, जिसे 1914 के शिमला समझौते के द्वारा ब्रिटेन और स्वतंत्र राष्ट्र तिब्बत के बीच एक औपचारिक रूप दिया गया था। हालांकि चीनियों को उस सम्मलेन में आमंत्रित किया गया था और चीन के पूर्ण अधिकारवाले दूत ने मसौदे की पहल भी की थी, लेकिन उन्होंने समझौते पर हस्ताक्षर नहीं लिए, क्योंकि उस समय तिब्बत, चीन का हिस्सा नहीं था, बल्कि वह एक स्वतंत्र राष्ट्र था। मैकमोहन रेखा ने नेफा (नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) जिसे अब अरुणाचल प्रदेश कहते हैं की भारत-तिब्बत सीमाओं को निर्धारित किया। भारतीयों और तिब्बतियों के बीच, यह रेखा विवादित नहीं थी और कानूनी रूप से पूरी तरह स्पष्ट थी  । यदि जमीनी स्तर पर सीमाओं की व्याख्या में कोई कठिनाई थी, तो इसे आपसी परामर्श और मैदानी सर्वेक्षण के द्वारा हल किया जा सकता था।

ब्रिटिशर वास्तव में रणनीतिकार थे। उन्होंने भारत की सुरक्षा सुनिश्चित की, जो उनके मुकुट में एक गहना था, क्योंके रूस और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच बफर राज्यों के रूप में तटस्थ देशों की वह एक कड़ी  था; और उस समय रूस को अँग्रेज खतरा मानते थे । बफर राज्यों की कतार में इराक, फारस, अफगानिस्तान और तिब्बत शामिल थे। वे इन बफर राज्यों पर अपने प्रभाव को बनाए रखने में कामयाब रहे, जिससे रूसी प्रभाव या उनकी सेनाएं बफर क्षेत्र में प्रवेश न करें और भारत पर कोई खतरा न हो।

जब भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिली, तो चीन एक गृहयुद्ध में उलझ गया। हमारा उत्तरी दिशा में पड़ोसी तिब्बत था और हमारी सीमाएँ उत्तर-पूर्व के तीन भारत, तिब्बत व बर्मा (आज का म्यांमार) के  संगम स्थल से लेकर उत्तर-पश्चिम के तीन भारत, चीन और अफ़गानिस्तान के संगम स्थल तक फ़ैली हुई  थीं। बाद के तीन के संगम स्थल अब पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। चीन में गृह युद्ध समाप्त हो गया और अक्टूबर 1949 में पीआरसी का गठन किया गया। भारत के पास अपनी उत्तरी सीमाओं और स्थल की सेनाओं को सुरक्षित करने के लिए दो साल से अधिक का नेतृत्व-युक्त स्पष्ट समय था। यह रणनीतिक नेतृत्व समय, जो भारत के पास था, हमारे नेतृत्व द्वारा गवाँ दिया गया, जो हमेशा आत्म-संतुष्ट थे कि तिब्बत के साथ जो सीमाएँ हैं, वे अच्छी तरह से परिभाषित और शांतिपूर्ण हैं। पीआरसी के गठन के एक साल बाद, अक्टूबर 1950 में, चीनी सैनिकों ने तिब्बत की संप्रभुता पर हमला किया और उस पर कब्जा कर लिया। तिब्बत ने भारत से मदद माँगी, लेकिन अस्वीकृति का बयान देने के अलावा भारत ने कुछ नहीं किया। आने वाले महीनों में, हमने न केवल चीनी आक्रमण को चुपचाप स्वीकार कर लिया, बल्कि 1954 में चीन के साथ व्यापार और परस्पर व्यवहार के करार पर हस्ताक्षर कर इसे वैध बना दिया और इस तरह हमने तिब्बत को चीन के एक हिस्से के रूप में मान्यता दी। भारत का रणनीतिक भोलापन ऐसा था कि हमने तिब्बत को चीन के एक हिस्से के रूप में बिना किसी प्रतिदान के मान्यता दे दी। हमने करार पर हस्ताक्षर करने से पहले, भारत-चीन सीमा को वैध बनाने हेतु हमने भारत-तिब्बत सीमा को औपचारिक रूप देना भी नहीं चाहा था । इस प्रकार हमने भारत और चीन के बीच तिब्बत के रूप में एक बफर राज्य को खो दिया, जिससे टकराव उत्पन्न होता है।

इसके तुरंत बाद चीनियों ने हमारे क्षेत्र में अचानक हमले करना शुरू कर दिया। तिब्बत को चीन के शिनजियांग प्रांत से जोड़ने के लिए अक्साई चिन में एक रणनीतिक सड़क बनाई गई थी। इसके बाद एनडब्ल्यूएफपी (अब अरुणाचल प्रदेश) और लद्दाख में घुसपैठ हो शुरू हो गई, जिससे अंततः 1962 में दुखद और अपमानजनक चीन-भारत युद्ध हुआ। युद्ध के अंत में, चीन ने अक्साई चिन के इस क्षेत्र के 37,555 वर्ग किलोमीटर को अवैध कब्जे में ले लिया । चीन के प्रति हमारे तुष्टिकरण का शुद्ध परिणाम यह रहा  कि भारत और तिब्बत के बीच एक स्थिर, शांतिपूर्ण और व्यवस्थित सीमा फिर विवादित, शत्रुतापूर्ण और वैमनस्य की चीन-भारत सीमा बन गई। इस प्रकार हमने अपने देश के लिए बहुत शत्रुतापूर्ण भू-युद्धनीतिक वातावरण तैयार किया है और हमें अब पाकिस्तान और चीन दोनों की शत्रुतापूर्ण ताकतों से संघर्ष करना है।

हमने जम्मू-कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के लिए कैसे गँवा दिया, यह एक और घिनौनी कहानी है, जिसे शायद ही कभी हमारे शाला के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है। संक्षेप में बताने के लिए; हमारी स्वतंत्रता के समय, महाराजा हरि सिंह जो जम्मू-कश्मीर राज्य के डोगरा नरेश थे, उन्होंने स्वतंत्र रहने की कामना की, क्योंकि उन्होंने अपना मन नहीं बनाया था; कि भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अनुसार, किस प्रमंडल में उन्हें शामिल होना है? आजादी के दो महीने बाद, पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण करने के लिए एक साजिश रची, जिसमें अनियमितताओं के साथ दिखावा था, जिसमें पाकिस्तान सेना के अधिकारियों द्वारा जनजातियों और वंशों को शामिल किया गया था। जैसा कि आक्रमण आगे बढ़ा, तब महाराजा की सेना में, जहाँ मुख्य रूप से मुसलमान थे, वे उन्हें छोड़कर विरोधी समूह में शामिल हो गए। महाराज ने इसके लिए भारत से मदद मांगी और नेहरू ने तब तक कोई मदद नहीं की, जब तक के महाराजा ने परिग्रहण-प्रपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए; अर्थात् जम्मू-कश्मीर राज्य का भारत द्वारा अधिग्रहण । इस देरी ने पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर राज्य के माध्यम से पाँच दिनों तक बिना किसी प्रतिरोध के अपनी गतिविधियों को मुक्त रूप से चलाने में सक्षम बनाया। अंत में महाराजा ने 26 अक्टूबर 1947 की रात को आत्मसमर्पण के प्रपत्र  पर हस्ताक्षर कर दिए ।

भारतीय सैनिक आधी रात के बाद श्रीनगर उतरे, मात्र दो घंटे पूर्व, जब पाकिस्तानी छापामार श्रीनगर की हवाई पट्टी पर पहुंच सकें । पहले भारत-पाक युद्ध 1947/48 की शुरुआत हो चुकी थी। तत्पश्चात भारतीय सैनिकों ने नौशेरा, राजौरी, उरी पर कब्जा कर लिया और वे जीत के जोश में थे। यह युद्ध में सर्वाधिक अनुपयुक्त  समय था, जब 01 जनवरी 1949 को यूएन में नेहरू ने युद्ध विराम लिया | यह युद्ध के इतिहास में बहुत दुर्लभ है, जहां एक विजेता राष्ट्र संघर्ष विराम चाहता है। यह भारत द्वारा किया गया था, जब जम्मू-कश्मीर का एक तिहाई हिस्सा फिर भी पाकिस्तान के हाथ में था। तब से यह अब तक बना हुआ है। यहाँ तक ​​कि पाकिस्तानी आक्रमण के बारे में संयुक्त राष्ट्र में प्रारंभिक शिकायत भी संयुक्त राष्ट्र चार्टर के गलत अध्याय के अंतर्गत दर्ज की गई थी। ‘आक्रमण के कृत्य के संबंध में कार्रवाई’;  इसके लिए अध्याय 7 के अंतर्गत शिकायत दर्ज करने के बजाय, भारत ने अध्याय 6 के अंतर्गत  शिकायत दर्ज की, जो  ‘विवादों के शांतिपूर्ण  निपटान’ के संबंध में था । पूर्व के अध्याय के अंतर्गत दर्ज  शिकायत में संयुक्त राष्ट्र को आक्रामक को बाहर निकालने के लिए बल का उपयोग करने का विकल्प दिया होता, जबकि अध्याय 6 के अंतर्गत दर्ज शिकायत में विवाद को मध्यस्थता और न्यायिक निपटान द्वारा समाप्त किया जाता है। गलत अध्याय के अंतर्गत इस मुद्दे को उठाने के हमारे भोलेपन ने पाकिस्तान को एक आक्रामक के स्थान पर विवादित के रूप में उसे पदोन्नत कर दिया। यह मुद्दा पिछले सात दशकों से किसी घाव में भरे हुए मवाद जैसा ही है।

यह दिखाता है कि रणनीतिक दृष्टि से विहीन किसी भी देश को नुकसान उठाना ही पड़ता है। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में ‘राज्य शक्ति’ का सारांश दिया है । उसने निष्कर्ष में राज्य की पहली शक्ति सशक्त संप्रभुता  बताई है और साथ में देश को आगे ले जाने की इच्छाशक्ति और बुद्धि-कौशल्य। दूसरी है; ‘राजकोष’ की शक्ति; राष्ट्र को आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहिए । अंतिम और उसके अनुसार सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है; ‘सशस्त्र बलों की शक्ति’, जिसे राष्ट्र को सुरक्षित रखने और अपने नियंत्रण में अधिक क्षेत्रों को लेने के लिए सशक्त होना चाहिए, जिससे लोगों की समृद्धि को बढ़ाया जा सके । भारतीय के रूप में, हमें अपने विरोधियों से अपने खोए हुए क्षेत्रों को वापस लेने के लिए एक मजबूत संकल्प की आवश्यकता है। हमें अपने देश को विकसित करने और अपने सशस्त्र बलों को मजबूत करने व साथ ही अपनी आर्थिक शक्ति को बढ़ाने की आवश्यकता है। हमारे ‘उच्च संरक्षा प्रबंधन’ पर एक पुनर्दृष्टि की आवश्यकता है । सेना, वायु सेना और नौसेना को एक रक्षा स्टाफ के प्रमुख के तहत समन्वित किया जाना है, जो सुरक्षा पर कैबिनेट समिति को एकल बिंदु पर सलाह दे सके। रक्षा मंत्रालय को देश की रणनीतिक आवश्यकताओं के संबंध में ठोस निर्णय लेने में सक्षम बनाने हेतु सेवा अधिकारियों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। क्षेत्रीय कमांड्स को भी एकीकृत किया जाना चाहिए, जहाँ तीन सेवाएँ मूल रूप से बिना अवरोध के काम कर सकें । ये मुद्दे नए नहीं हैं और अतीत में कई समितियों में ये दोहराए गए हैं। लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में 2001 में राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली पर मंत्रियों के समूह ने और बाद में 2012 में नरेश चंद्र समिति ने स्वतंत्र रूप से उपरोक्त बिंदुओं की सिफारिश की है, हालांकि, वे अकार्यान्वित बने हुए हैं। हमारे देश में ‘उच्च सुरक्षा प्रबंधन’ की त्वरित समीक्षा की आवश्यकता है, जिससे हम उन्हीं गलतियों को पुनः न करें, जो अतीत में हमारे नेतृत्व द्वारा की गई थीं । प्रत्येक पीढ़ी का दायित्व है कि वह अगली पीढ़ी को शांतिप्रद और सुरक्षित सीमाएँ प्रदान करें। क्या हम इस पहलू में असफल हो रहे हैं?

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