“संयम , सदाचार और स्वदेशी का समय”

देश के सबसे बड़े अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ( AIIMS ) के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया ने हाल ही में जब बताया कि आने वाले दो महीनो, यानि जून और जुलाई में भारत में कोरोना संक्रमित मरीज़ों की संख्या अपने चरम पर होगी , तो इससे दो चीज़ें बिलकुल साफ़ हो जाती हैं। पहली  यह  कि लॉकडाउन से वायरस मरा नहीं है अपितु यह  उसके फैलाव की गति को कम करने के लिए किया गया था और जैसे जैसे  लॉकडाउन खुलेगा वैसे-वैसे खतरा बढ़ता चला जायह गा। दूसरा यह  कि सरकार अब अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर काम कर रही है जिसकी वजह से छूट देनी आवश्यक है और इसीलिए हम लोगों को अब अधिक सतर्क रहने  की आवश्यकता है। वर्तमान परिदृश्य में इस संक्रमण के फैलने की गति के अनुसार अगर हम यह  मानकर चलें कि यह  वायरस इसी गति से फैलेगा तो 31 जुलाई तक भारत में मरीज़ों की संख्या सवा करोड़ के आस पास पहुँच जाएगी। और यह  संख्या वायरस की गति के हिसाब से घटती या बढ़ती रहेगी।

वर्तमान परिस्थितियों में सरकार के साथ साथ हम सभी आमजन की भी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। आने वाले समय में हमें और ज्यादा संयम और सावधानी से काम लेना पड़ेगा। नि:संदेह हम सभी ने लॉकडॉन के दौरान बहुत ही तत्परता से इसका पालन किया है लेकिन अब सड़कों पर हलचल देखकर सभी को संयम रखना होगा। नियम वही रहेगा , अगर बहुत ज़रूरी है तभी घर से निकलें और अगर निकलें तो 2 गज की दूरी और मुँह पर कपडा बांधकर निकलें।

इस महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित वो गरीब लोग हैं जो रोज़ सुबह काम की तलाश में अपने परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था करने के लिए निकलते थे ।ताकि शाम को उनके घर में चूल्हा जल सके, रोज़ मेहनत करके कमाने और खाने वाले व्यक्ति पर इस बीमारी की सबसे ज्यादा मार पड़ी है। ऐसे लोगों के लिए हमें संवेदनशील रहकर ऐसा व्यवहार करना होगा जिसमे उच्चता का भाव हो। ऐसे परिवारों की यथासंभव मदद करने के लिए सभी को आगे आना चाहिए और 1 परिवार की आर्थिक और भावनात्मक रूप से उसको सशक्त बनाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर चुनौतियां बहुत अधिक हैं। आमजन पर इसका प्रभाव कम से कम पड़े इसके लिए सरकार के साथ साथ हम सभी को मिलकर काम करना होगा। जवाबदेही सरकार की जरूर है लेकिन सब कुछ सरकार ही करेगी , इस सोच को बदलते हुए स्वावलम्बी होना होगा , स्वदेशी को अपनाना होगा। देश में ही बनाना होगा , देश का बना ही खाना होगा और जो नहीं बन पायह गा उसको छोड़ना होगा। 

संकट की इस घडी से निकलने के लिए हमें अपने अंदर आत्मविश्वास लाना होगा,आस्तिक बनना होगा। यहाँ आस्तिक बनने से अभिप्राय केवल भगवान में विश्वास रखने से नहीं है , अपितु स्वयं पर विश्वास रखने से भी है क्योंकि जिसे अपने आप  पर विश्वास नहीं होता उसपर ईश्वर भी विश्वास नहीं करते। यदि हम स्वयं ही अपना मोल नहीं समझते तो दुनिया हमें श्रेष्ठ क्यों स्वीकार करेगी। सारी दुनिया चाहे कहती रहे कि हम हारेंगे किन्तु हमारा मन और विश्वास कहता है कि हम जीतेंगे , तो दुनिया की कोई भी ताकत हमें हरा नहीं सकती। इसी आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ हम कोरोना  को हरायेंगे और देश को सबल , स्वाभिमानी और स्वावलम्बी बनाएंगे।

                                                                                     जय हिन्द , जय सीमा संघोष

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