क्या महामारी करवायेगी महायुद्ध ?

कोरोना नामक महामारी के कारण विश्व और भारत में जिस प्रकार की समस्याओं ने जन्म लिया है, इसके कारण पूरे विश्व में लोगों के मन मस्तिष्क में अनेक प्रकार की बातें, कोरोना के बाद के परिदृश्य को लेकर उठने स्वाभाविक भी हैं और उठ भी रहे हैं। कोरोना के आने के बाद विश्व स्तर पर देशों के बीच निःसन्देह परस्परनिर्भरता और परस्परपूरकता बड़े पैमाने पर बढ़ी है; इसमें कौन सा देश सक्षम है, कौन सा अक्षम है; कौन प्रभुत्व वाला है और कौन प्रभुत्वहीन है, यह बात बेमानी साबित हो रही है। वैश्विक स्तर पर विकास और शक्ति के केन्द्र एवं ध्रुव के रूप में जाने और माने जाने वाले देश अपने अहंकार को त्यागकर उन देशों से सहायता माँगने को विवश हुये हैं; जिन देशों का महत्व उनकी दृष्टि में बहुत कम रहा है। केवल इतना ही नहीं है विश्व के ऐसे देश जिनका किसी देश से मित्रता का भाव या किसी प्रकार का लगाव नहीं था, वे देश भी ऐसे देशों से सहायता पाने के लिये आतुर हैं। किन्तु इसका यह कत्तई आशय या अर्थ नहीं लगाना चाहिये कि आने वाले समय में अर्थात कोरोना की समाप्ति के बाद राष्ट्र-राज्य की अवधारणा और मजबूत हो जायेगी अथवा यह खण्डित हो जायेगी और वैश्विक एकजुटता आ जायेगी। ऐसा सम्भव नहीं होगा।

दूसरी तरफ ऐसी विपदा और महामारी के बाद इससे निपटने के लिये राज्य अर्थात सरकारें अपने संसाधन और तकनीकी से इसके उपाय अपने-अपने तरह से करती हैं। दुनिया के बहुत से देशों और भारत में भी लॉकडाउन और इसकी निगरानी को लेकर अनेक प्रकार के तरीके उच्चतम नवीनतम तकनीकऔर हथकण्डे अपनाये जा रहे हैं। क्योंकि व्यक्ति दुनिया में व्याप्त प्रकृति की विरोधी संकल्पनाओं से प्रभावित होकर स्वतंत्रता और उससे भी आगे बढकर स्वक्षन्दता का भूखा हो गया है और होता जा रहा है। सरकारें अपना कर्तव्य और उत्तरदायित्व समझकर व्यक्ति अर्थात अपने नागरिक का अहित न हो, इसलिये बहुत से मामलों में अपने नागरिकों की निगरानी और नियन्त्रण कर रही हैं और निर्देशों का ठीक से पालन न करने के कारण दण्डित भी कर रही हैं। प्रथम दृष्टि से यह राज्य का कर्तव्य भी प्रतीत होता है। इस निगरानी एवं नियन्त्रण प्रक्रिया में सरकार अपने नागरिकों के व्यक्तिगत और निजी जीवन की छानबीन और देखरेख कर रही है; जिसे कोई कह सकता है कि व्यक्ति की निजता का हनन हो रहा है। व्यक्ति कब कहाँ है? किससे कब मिला आदि! क्या ये सभी निगरानी के विषय हैं? 

उपरोक्त का सहज उत्तर है, नहीं।  लेकिन यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि इससे व्यक्ति, राष्ट्र-राज्य एवं वैश्विक स्तर पर पारदर्शिता बहुत बढ़ी है; पारदर्शिता बढ़ना किसी भी समाज के लिये शुभ संकेत है, चाहे समाज इसे चाहकर स्वीकार करे या अनचाहे में स्वीकार करे। फिर भी यह निगरानी एवं पारदर्शिता परिस्थितिजन्य है कि, उसकी निगरानी की जाये अथवा व्यक्ति स्वयं से इस बात का आदी या अभ्यासी हो कि वह निर्देशों और व्यवस्था का ठीक से पालन करे; जिससे राज्य आश्वस्त हो और उसे विश्वास हो कि बिना निगरानी के ही निर्देशों का पालन हो जायेगा। यह आदर्श व्यवस्था है, जो सम्भव नहीं है।  क्योंकि प्रकृति के नियम भी इस आदर्श व्यवस्था की अनुमति नहीं देते। आशय यह है कि सी सी टी वी या उससे भी उच्च तकनीकी  की निगरानी में आप रहना पसन्द करेंगे या श्रेष्ठ नागरिक विवेक या जागरूकता का परिचय देते हुये निगरानी व्यवस्था को हतोत्साहित और पारदर्शिता को प्रोत्साहित कर देंगे? इसका भी सहज और सामान्य उत्तर है कि कोरोना के बाद दोनों में से कोई एक नहीं होगा अर्थात दोनों की आंशिक स्थितियां रहेंगी।     इसके फलस्वरूप दुनिया के लोग जो लिखते पढ़ते सोचते विचार करते हैं। उनका कहना है कि उपरोक्त दो चीजों में से, दोनों में एक-एक का आपको चयन करना पड़ेगा। किन्तु आगामी परिस्थिति और प्रकृति अर्थात सृष्टि एवं वैश्विक संरचना के अनुसार यह किसी भी दशा में सम्भव नहीं है कि, दुनिया के लोग एक: राष्ट्र-राज्य या वैश्विक एकता में से किसी एक को और दो: सम्पूर्ण निगरानी या पारदर्शिता तन्त्र या पूर्ण नागरिक जागरूकता में से किसी एक का चयन करें; न तो ऐसी परिस्थिति उत्तपन्न होगी और न ही इस प्रकार व्यक्तिगत या वैश्विक जरूरत ही महसूस होगी। क्योंकि जो देश कभी मूल्यवान नहीं समझे गये, उनके भी मूल्य इस विपदा में सामने प्रकट हुये हैं और जो मूल्यवान थे, वे तो मूल्यवान हैं ही। एक तीसरा विषय भी है कि कोरोना नामक महामारी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह मानव द्वारा या किसी देश द्वारा जानबूझकर या गलती से पैदा की हुई समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की भूमिका संदिग्ध है और उसकी बातों में विश्वास नहीं किया जा सकता; वह चीन का पक्षपाती बनकर खड़ा हुआ है। क्योंकि- यदि यह प्राकृतिक आपदा थी तो चीन ने इसको दुनिया में फैलने से रोका क्यों नहीं? जनवरी अन्त में, फरवरी और मार्च बड़ी संख्या में लोगों को बाहर क्यों जाने दिया? समय से अर्थात 15 जनवरी से पहले ही दुनिया को इस सम्बन्ध में आगाह क्यों नहीं किया? इस कारण भी उपरोक्त एक एवं दो अवधारणाएँ एवं विचार कहीं भी अस्तित्व में नहीं ठहरते; क्योंकि यह कृत्रिम और प्रायोजित विपदा है। इस कारण निम्न चीजें ध्यातव्य है:

1. देशों के मूल्य अर्थात महत्व के क्रम में मूल्य की यह बृद्धि दुनिया में अस्तित्व और वर्चस्व के संघर्ष को बढ़ायेगा और अस्तित्व एवं वर्चस्व के सहयोग को भी बहुत बढ़ायेगा।

2. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुये शीतयुद्ध का कालखण्ड पूरी तरह खत्म होगा और गर्मयुद्ध के एक नये वातावरण का सृजन होगा।

3. चीन में व्यापक रक्तपात होगा, सरकार और जनता के बीच तथा आपस में भी चीन  के अन्दर खूनी संघर्ष हों और यह भी सम्भव है कि चीन 8 या 12 खण्डों में टूटकर विभक्त हो जाय या यों कहें कि बिखर जाये ।

 वर्तमान परिदृश्य देखने से स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है कि कोरोना के बाद शेष विश्व की स्थिति वर्तमान विश्व की राष्ट्र-राज्य की संरचना के अनुरूप ही रहेगी और विश्व के देशों के बीच परस्परपूरकता एवं परस्परनिर्भरता का एक भिन्न प्रकार का समीकरण प्रकट होगा। यह समीकरण दुनिया में मानवता और मनुष्यता के पक्ष एवं विपक्ष के अनुसार निर्धारित होगा; क्योंकि वर्तमान समय में दो ध्रुव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहे हैं; एक मानवता और मनुष्यता के लिये कार्य करने वाला अर्थात प्रकृति की संस्कृति के अनुसार आचरण करने वाला होगा और दूसरा पक्ष अपने निहित स्वार्थ में मानवता और मनुष्यता को बलि चढ़ा देने वाला अर्थात प्रकृति की संस्कृति के विरुद्ध आचरण करने वाला होगा। 

यहाँ यह बात ध्यान में रखना होगा कि- प्रकृति, विद्या-ज्ञान-विज्ञान के सतर्क और न्यायपूर्ण युग्म को सदैव प्रश्रय देती है। यद्यपि कि दूसरे पक्ष अर्थात अमानवीय के साथ खड़े लोगों की वर्तमान संख्या व्यक्ति के स्तर पर और राष्ट्र-राज्य के स्तर पर कम जरूर है; लेकिन शून्य नहीं है। बहुत से लोग जो दूसरे पक्ष का विचार रखते हैं, वे तात्कालिक वैश्विक परिस्थितियों और दबाव के कारण दूसरे अर्थात अमानवीय पक्ष के साथ खड़े तो नहीं हो रहे; लेकिन कहीं ना कहीं उनके हिमायती हैं और कोरोना की परिस्थिति बदलते ही पूरी ताकत से उनके साथ खड़े होंगे। इसलिये पहले वर्णित दोनों अवधारणाओं की आगामी परिस्थिति के लिये कोई स्थान नहीं दिखाई पड़ता। कारण स्पष्ट है विश्व में पिछली शताब्दी के दोनों विश्वयुद्ध की भूमिका प्रस्तावना पृष्ठभूमि और परिणाम की यदि विस्तृत विवेचना की जाय तो स्पष्ट होता है की दोनों विश्वयुद्ध वर्चस्व और अस्तित्व के लिये ही हुये हैं। वर्चस्व और अस्तित्व के लिये प्रकृति के तत्व आपस में एक दूसरे के विरुद्ध और पक्ष में कार्य करते भी हैं; इस नियम को प्रकृति प्रोत्साहित भी करती है। यद्यपि सभी तत्व प्रकृति के ही अंश हैं, उनका निर्माण स्थान एक ही है; फिर भी किसी तत्व पदार्थ व्यक्ति या जीव की जो निजी विशेषताएँ होती हैं, वे अपनी उन विशेषताओं के लिये सहज और स्वाभाविक रूप से अपना उत्तरदायित्व समझकर प्रकृति के नियम के अनुसार कार्य करते हैं। इसलिये आने वाले समय में अर्थात कोरोना के बाद विश्व राजनीति, विश्व समाजनीति, विश्व अर्थनीति, विश्व कूटनीति में किसी भी प्रकार के बदलाव की कोई सम्भावना नहीं है, समीकरण अवश्य पूरी तरह बदलेंगे। लोग प्रकृति की तरफ उन्नमुख होंगे; स्वउद्योग, गृहउद्योग एवं हस्तनिर्माण उद्योग तथा इनके आधार को बढ़ावा मिलेगा।

अन्धाधुन्ध प्राकृतिक विनाश कमजोर पड़ेगा; स्वदेशी का भाव पैदा होगा; लोगों का मानवता के प्रति झुकाव होगा। अत्याधुनिक किन्तु प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित करने वाली तकनीकों का विकास एवं प्रयोग होगा। प्राकृतिक नव्यकरणीय ऊर्जा का अधिकतम प्रयोग होगा और प्रदूषण पर रोक लगेगा। कुल मिलाकर जैविक- अजैविक आधार वाली मानवीय चेतना का विकास होगा और जो देश इसके पक्षधर रहे हैं या हैं उनकी भूमिका आगामी समय में विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण होगी; उनके लिये अवसर और संभावनाएँ निरन्तर बेहतर होती जायेंगी। लेकिन एक निश्चित कालखण्ड अर्थात कुछ दशकों के लिये वैचारिक संघर्ष भी बढ़ेगा। यह संघर्ष मानवतावादियों एवं अमानवीय विचार के बीच होगा। अर्थात अन्ततः प्रगति के लिये सहयोग का वर्चस्व बढेगा तथा प्रगति के लिये संघर्ष का वर्चस्व घटेगा। मानवीय पक्ष और अमानवीय पक्ष के बीच चीन में तीव्र संघर्ष होगा।  वैश्विक मानवीय पक्ष का नेतृत्व भारत करेगा; किन्तु अभी से भारत को सतर्क एवं सावधान दृष्टि रखनी होगी; अपने वैचारिक आधार को बहुत मजबूत रखना होगा, सम्भव है कि भारत में भी छोटे-मोटे वैचारिक संघर्ष हों।       

इस विषय के विवेचन का एक दूसरा पक्ष भी है। इसके अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया में वायरस के बड़ते मायाजाल और बढ़ते  लॉकडाउन के कारण, बिज़नेस लीग द्वारा जारी 15 अप्रैल, 2020 के निर्णय के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन को अमेरिकी फण्ड में व्यापक कटौती करने का निर्णय लिया है। इस कटौती के साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर उसके चीन की गलत पक्षधरता हेतु आरोप भी लगाया। डोनाल्ड ने यह भी कहा कि, संयुक्त राष्ट्र संघ ने कोरोनोवायरस संकट को सरकारों द्वारा नजरअंदाज करने की बात कही है और बताया है कि, कैसे और कब उनकी संघर्षशील अर्थव्यवस्थाओं को काम पर वापस जाना है, संयुक्त राष्ट्र संघ के इस बात का भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ध्यान नहीं दिया है। कोरोना नामक घातक महामारी पहले ही दुनिया भर में लगभग 200,000 से अधिक लोगों का जीवन ले चुकी है। दुनिया भर में लगभग तीस से पैंतीस लाख लोग संक्रमित हैं। यह पहली बार पिछले साल के अन्त में चीन में उभरा था। ज्ञात हुआ है कि, यह चीन के वुहान  की एक रासायनिक प्रयोगशाला में जैविक अस्त्र बनाने के दौरान अनचाहे रिसाव से यह परिस्थिति पैदा हुई। चीन को यह अन्देशा था, इसलिये चीन ने सितम्बर 2019 में ही वुहान  के पास दस हजार शैय्या का अस्पताल बनाकर तैयार रखा था। इनकी खुफिया सूचना रूस को भी थी, इसलिये रूस ने भी दो दो हजार शैय्या के दो अस्पताल मास्को और उसके पास बनाकर अगस्त 2019 में ही तैयार कर लिए थे। 

वस्तु स्थिति यह है कि जो कार्य चीन कर रहा था, वही कार्य अमेरिका भी कर रहा था; लेकिन पूरी सावधानी से। जबकि चीन इस हड़बड़ी में था कि, कैसे वह अमेरिका से आगे निकलकर मानवता को लीलने वाली इस घातक सफलता का ढिंढोरा पीट सके। इस जल्दीबाजी में चीन चूक गया और वैश्विक तथा स्वदेशी नागरिकों का विलेन बनने से अपने आपको नहीं रोक सका। चीन की यह बेचैनी विश्व में एकल ध्रुव बनने की बेचैनी के कारण थी। अमेरिका और रूस को यह बात किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं थी और न है और न ही विश्व के अन्य सक्षम देशों को यह बात स्वीकार है और न ही स्वीकार होगी। क्या इस योजना की बहुत समय पहले से ही कुछ को जानकारी थी? यदि थी तो वे भी इस विषय से मानवता को सतर्क एवं सावधान करने का कोई यत्न क्यों नहीं किये? ट्रम्प ने कहा कि- वह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिये क्षितिज पर ‘प्रकाश की किरणों’ को देख रहे हैं; लेकिन उन्होंने, कड़ी भाषा में कुप्रबन्धन और कोरोनोवायरस के प्रसार को कवर न कर पाने के लिए डब्ल्यूएचओ पर  और उसके माध्यम से चीन पर हमला भी किया। अमेरिकी राष्ट्रपति भवन अर्थात व्हाइट हाउस में संवाददाताओं से डोनाल्ड ने कहा- ‘हमें इस बात की गहरी चिन्ता है कि, अमेरिका की उदारता को दुनिया के लोग अपने सर्वोत्तम उपयोग के लिये दुरुपयोग करना चाहते हैं, लेकिन अमेरिका ऐसा नहीं होने देगा’। डोनाल्ड ने जिनेवा स्थित एजेंसी पर ‘ट्रान्समिशन और मृत्यु दर के बारे में गलत जानकारी’ का प्रचार करने का भी आरोप लगाया और कहा कि चीनी डेटा पर इनकी निर्भरता से ‘दुनिया भर में मामलों में बीस गुना वृद्धि की सम्भावना है।’ अमेरिका ने पिछले वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन को 400 मिलियन डॉलर का योगदान दिया था। ट्रम्प ने ‘चीन-केन्द्रित’ संस्था को परोक्ष रूप से निशाने पर लेते हुये, उसको अमेरिका के अवमानना ​​से तो नहीं जोड़ा; लेकिन चीन के कास्टिक बार हैक को बढ़ाने के लिये पेंच जरूर टाइट किया, खासकर तब जब संकट खत्म होने की दिशा में है। 

 अमेरिका, भारत सहित पूरा विश्व कोरोना के बाद के आर्थिक पूर्वानुमान लगाने और उसकी भरपायी में दिमाग लगा रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भविष्यवाणी की  था कि- ‘ग्रेट लॉकडाउन 1930 की महामन्दी के बाद से सबसे खराब वैश्विक मन्दी को यह महामारी जन्म देगी। अमेरिका के वाशिंगटन स्थित अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि- ‘वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस साल तीन प्रतिशत की कमी आने की सम्भावना है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के 5.9 प्रतिशत तक पीछे होने की स्थिति बनेगी। दुनिया भर में बुरे विकास परिणाम सम्भव हैं। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य निष्कर्षों के आधार पर यह स्पष्ट है कि- यदि ट्रम्प, विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिंग रोकते हैं, तो दुनिया में एक भिन्न प्रकार का गर्मी भरा राजनीतिक और और सामरिक संकट खड़ा होगा। आई एम एफ ने कहा है कि- ‘2020 और 2021 में, वैश्विक जीडीपी तीन प्रतिशत या लगभग नौ ट्रिलियन डॉलर तक फिसल सकती है। जापान और जर्मनी की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में यह फिसलन अधिक होगी।’ लेकिन यदि वायरस नियन्त्रित है और अर्थव्यवस्थायें फिर से समय से काम करना शुरू कर सकती हैं, तो 2021 में लगभग छः प्रतिशत का पुनर्निवेश होने की सम्भावना के साथ अच्छा संकेत आयेगा। विभिन्न देशों की सरकारों ने भी अर्थव्यवस्था के डाँवाँडोल होने के संकेत एवं दृष्टिकोण जारी किये हैं। फ्रांस ने कहा है कि- उसकी अर्थव्यवस्था 2020 में आठ प्रतिशत तक कम होगी, ऐसा अनुमान है। ब्रिटेन ने अपने देश की जीडीपी में तेरह प्रतिशत के गिरावट की भविष्यवाणी की है।

यह स्पष्ट है कि, प्रथम विश्वयुद्ध ‘वर्चस्व एवं अस्तित्व’ का युद्ध था और  वह स्थल एवं जलमार्ग से लड़ा गया। वह वस्तुओं एवं सेवाओं हेतु कच्चेमाल की औपनिवेशिक महत्वाकांक्षा के कारण लड़ा गया। द्वितीय विश्वयुद्ध भी ‘वर्चस्व एवं अस्तित्व’ का युद्ध था और वह स्थल जलमार्ग एवं वायुमार्ग तीनों से लड़ा गया। वह वस्तुओं एवं सेवाओं के अधिक उत्पादन एवं आयात-निर्यात के कारण उपजे कसमकस की महत्वाकांक्षा के कारण लड़ा गया। तृतीय विश्वयुद्ध भी ‘वर्चस्व एवं अस्तित्व’ का युद्ध होगा और यह स्थल जलमार्ग वायुमार्ग एवं अदृश्य सूक्ष्ममार्ग चारों से लड़ा जायेगा। वह वस्तुओं एवं सेवाओं के अधिक उत्पादन एवं विपणन एकाधिकार के कारण उतपन्न महत्वाकांक्षा के कारण लड़ा जायेगा। प्रथम विश्वयुद्ध के आसपास और उसके बाद विश्व वैश्विक ‘शीतोष्णयुद्ध’ के कालखण्ड में था। द्वितीय विश्वयुद्ध के आसपास और उसके बाद विश्व वैश्विक ‘शीतयुद्ध’ के कालखण्ड में था। तृतीत विश्वयुद्ध के आसपास और उसके बाद विश्व वैश्विक ‘उष्णयुद्ध’ के कालखण्ड में है और होगा। क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध वैश्वीकरण- उदारीकरण- निजीकरण का गर्भाधान था; द्वितीय विश्वयुद्ध उसका शैशवावस्था और तृतीत विश्वयुद्ध उसकी प्रौढ़ावस्था होगा। इस कारण कोरोना, इसकी पृष्ठभूमि एवं इसके समेकित परिणाम की दृष्टि से अब यह तय है कि, आने वाले समय में वैश्विक राजनीतिक समरिक आर्थिक एवं वैचारिक समीकरण व्यापक पैमाने पर बदलेगा एवं शीतयुद्ध के बाद गर्मयुद्ध की विभीषिका में विश्व खौलेगा, जलेगा और धूँआ उगलेगा। इसमें निःसन्देह भारत जैसे अर्थात अप्रतिस्पर्धावादी, मानवतावादी एवं प्रकृतिवादी विचार, देश एवं राष्ट्रों के भविष्य उज्ज्वल होंगे। अब दुनिया को निजीकरण, उदारीकरण जैसे मोहजाल से बचकर पारदर्शिता एवं शुचितापूर्ण राजनीति, अर्थशास्त्र, जीवन आदि चलाना होगा। आने वाले समय में एक इनका पक्ष होगा और एक इनका विरोधी पक्ष होगा।

कौस्तुभ नारायण मिश्र

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