कोरोना संकटकाल में बढ़ते साइबर अपराध

वैश्विक महामारी की मार अभी थमी नहीं है। प्रतिदिन संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं और इसी बीच केन्द्र एवं प्रदेश की सरकारों ने कुछ कुछ ढील देना प्रारंभ कर दिया है। स्वभाविक है हर कोई काम धंधा वर्क-फ्रॉम-होम (घर से कार्य करने की) विधि से नहीं चल सकता इसलिए अब धीरे धीरे अर्थ व्यवस्था को भी पटरी पर लाना आवश्यक है। घर से कार्य करने की विधि सभी प्रकार के व्यवसायों के लिए पर्याप्त भी नहीं है और जिनके लिए पर्याप्त है भी – वे भी इसके लिए पूर्णतः तैयार भी नहीं थे। इसलिए गत तीन चार महीनों में ये पाया गया है कि साइबर अपराधों में दो से तीन गुना की वृद्धि हुई है।

बड़ी कंपनियों की आई॰ टी॰ टीमें साइबर हमलों को झेलने और उन्हें निरस्त करने में सक्षम होती हैं। परंतु छोटे मोटे उद्योगों के लिए ये सब एक प्रकार से नया अनुभव ही है। सामान्य ऑडियो विडियो कॉल इत्यादि को छोड़ दें तो इसके अलावा बहुत से कर्मियों को तो इससे अधिक कुछ आवश्यकता ही नहीं पड़ी होगी। परंतु आज स्थिति ये है कि घर से काम करते समय कंपनी की गुप्त जानकारियाँ (फाइलें) भी सहयोगी आपस में साझा करते हैं। जो कि पहले व्यक्तिगत रूप से मिल कर दिया करते थे। इससे एक बहुत बड़ा ख़तरा इन कंपनियों के ग्राहकों की गोपनीयता पर भी मंडरा रहा है।

स्कूल के बच्चे एवं शिक्षक दोनों ऑनलाइन साधनों के लिए तैयार नहीं थे। परंतु रातों रात जैसे डिजीटल क्रांति आ गई है। भारत के लाखों विद्यालय अब इस विधि से शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। नाम मात्र के प्रशिक्षण के बाद ये सब चालू तो हो गया है परंतु यहाँ भी गोपनीयता धज्जियाँ उड़ती दिख रही हैं। पिछले दिनों अमरीका की ज़ूम कंपनी के विडियो कान्फ्रेंसिंग सॉफ़्टवेयर के बारे में जो ख़बर आई है वह डराने वाली है। पता चला है कि आप जो भी चर्चाएँ ज़ूम सॉफ़्टवेयर पर करते हैं वे सब चीन के रास्ते होकर गंतव्य तक पहुँचती हैं। ऐसे में किस सॉफ़्टवेयर को काम में लें किसको नहीं इसकी जानकारी के लिए विद्यालयों के पास न तो निपुणता है और न ही इस बात के लिए वे चिंतित दिख रहे हैं।

अधिकतर देशों में आधिकारिक तौर पर लॉकडाउन की घोषणाएँ हो चुकी हैं। सुरक्षा विशेषज्ञ इस बात से चिंतित हैं कि ये परिस्थितियाँ साइबर अपराधियों के लिए हर तरह से अनुकूल हैं। न चाहते हुए भी बहुत से देशों को अब डिजीटल ट्रांजेक्शनों का सहारा लेना पड़ रहा है। जहाँ भारत ने समय रहते इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का आधारभूत ढाँचा तैयार कर लिया था वहीं बहुत से विकसित देश भी ऐसे समय के लिए तैयार नहीं थे। जल्दबाज़ी में तैयार किए गए लेनदेन के साधन उतने सुरक्षित भी नहीं होते जितने गंभीरता से अध्ययन करके बनाए गए उपकरण होते हैं।

अमरीका की आपराधिक मामलों की जाँच करने वाली एजेंसी फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफ॰ बी॰ आई॰) के उप सहायक निदेशक टोन्या उगोरेट्ज ने एस्पेन इन्स्टिट्यूट द्वारा आयोजित एक पैनल चर्चा में बताया कि साइबर अपराधों की संख्या इस महामारी के काल में चार गुना बढ़ गई है। जहाँ पहले एक दिन में एक हज़ार मामले आते थे वहीं अब यह संख्या तीन से चार हज़ार तक हो चुकी है। पूरी चर्चा देखने के लिए यहाँ जाएँ – https://www.aspeninstitute.org/events/fight-back-how-to-stop-cyber-criminals-during-the-pandemic/.

कैसे कैसे होते हैं ये ऑनलाइन अपराध

  1. फ़र्ज़ी दस्तावेज एवं वेबसाइट जो कि ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोरोना संबंधी कुछ जानकारी उपलब्ध करा रहे हों। इनके माध्यम से फ़िशिंग कैंपेन चला कर मालवेयर (हानि पहुँचाने वाले सॉफ़्टवेयर) को कंप्यूटर पर स्थापित कर पासवर्ड इत्यादि चुराना।
  2. जहाँ कोरोना संबंधित जाँच एवं वैज्ञानिक अनुसंधान चल रहे हों ऐसे संस्थानों पर साइबर अटैक कर के फिरौती की भी माँग के मामले कई देशों से सामने आए हैं।
  3. कोरोना संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने जैसी प्रतीत होने वाली कई मोबाइल ऐप भी पैसा ले रही हैं। घबराए हुए लोग ख़रीद भी लेते हैं और बाद में पता चलता है कि ऐसी कोई विशेष जानकारी भी नहीं मिली।
  4. जो लोग पहली बार घर से काम कर रहे हैं तथा जिनको ज़्यादा तकनीकि जानकारी नहीं है – जैसे अध्यापक इत्यादि – उनको जब कोई कठिनाई होती है तो वे गूगल पर उसका हल ढूँढते हैं। इसका लाभ भी कई अपराधी उठाते हैं। अपनी वेबसाइट पर मदद करने के लिए वे बिंदू लिख कर रखते हैं और उन बिंदुओं का क्रम से पालन करने पर सामान्य व्यक्ति जाल में फँस जाता है।
  5. फ़र्ज़ी मास्क, सेनिटाइजर, दवाई इत्यादि बेचने के उद्देश्य से शुरू की हुई वेबसाइटों पर बहुत से लोग पैसे दे चुके हैं।
  6. अफ़वाहें उड़ाना, ग़लत जानकारी देना भी अपराध ही हैं। बहुत सी ऐसी वेबसाइटें भी हैं जो ये काम भी कर रही हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से भी कुछ लोग यह ग़लत काम कर रहे हैं। समस्या ये है कि ये नाम बदल बदल कर आते रहते हैं तो ऐसे अपराधियों को रोकना बहुत ही कठिन कार्य है।

चिंता की बात ये है कि इस प्रकार के अपराध का शिकार हुए लोग इस बात की जानकारी भी लोक लज्जा के कारण प्रशासन को नहीं देते। यदि सभी लोग ये जानकारी दें तो अपराधियों को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।

अपराधियों से बचने के लिए कुछ सुझाव

  1. अपकी महत्वपूर्ण फ़ाइलों को कम से कम दो स्थान पर सुरक्षित रखें। हो सके तो एक कॉपी क्लाउड पर रखें। गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट जैसी कंपनियाँ कुछ जगह फ़्री में भी देते हैं। परंतु इस प्रकार की कंपनियों को कुछ पैसा देकर प्रीमियम स्पेस ख़रीदना भी ठीक ही है।
  2. जब भी कोई वेबसाइट खोलें तब यू॰ आर॰ एल॰ देख कर ये सुनिश्चित करें की आप सही वेबसाइट देख रहे हैं।
  3. जिन वेबसाइटों पर आप अपना पासवर्ड इत्यादि गुप्त जानकारी डालते हैं उनके यू॰ आर॰ एल॰ की जाँच कर के ये सुनिश्चित करें कि वे https प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं, केवल http का नहीं।
  4. अपने घर के वाईफ़ाई नेटवर्क का पासवर्ड किसी भी बाहरी व्यक्ति से ना शेयर करें ,यदि कभी दिया भी हो ऐसा याद हो तो पासवर्ड को शीघ्र ही बदल देना चाहिए। वैसे हर एक पासवर्ड को समय समय पर बदलते रहना चाहिए।
  5. लुभावने से दिखने वाले फ़्री के ऐप या डेस्कटॉप ऐप्लीकेशन बिना जानकारी के न इंसटाल करें। ऐसा कुछ करने से पहले आप किसी विशेषज्ञ मित्र की मदद भी आप ले सकते हैं।
  6. अपने कंप्यूटर को एंटीवायरस सॉफ़्टवेयर के द्वारा समय समय पर स्कैन करते रहें।
  7. कंप्यूटर या मोबाइल के ऑपरेटिंग सिस्टम को एकदम नवीनतम वर्जन पर रखें। समय समय पर नए वर्जन की उपलब्धता की जाँच भी करते रहें।
  8. बच्चों को अवश्य बताएँ की कैसे ऑनलाइन सुरक्षा नियमों का पालन करना है। उसके फ़ायदे नुक़सान की जानकारी दें।
  9. ई-मेल में संलग्न (अटेचमैंट) फ़ाइलों को सावधानी से खोलें। बहुत सी फ़ाइलें खुलते समय आपके कंप्यूटर पर वायरस स्थापित कर सकती हैं। हो सके तो खोलने से पहले एंटीवायरस द्वारा फाइल की जाँच कर लें।

प्रकृति अपने मूल स्वरूप में लौट रही है। परंतु मानव? बढ़ते अपराधों को देखकर यह विचार मन में आता ही कि क्या हम कभी प्रकृति और महायंत्रों द्वारा फैलाए गए इस जाल के बीच संतुलन बना पाएँगे। आधुनिक व्यवस्था के कारण अपराध तो कम दिखते हैं। परंतु प्रकृति प्रसन्न नहीं है। और हम जंगल राज की ओर भी नहीं लौट सकते। ऐसे में यह संतुलन तो बनाना ही होगा। क्या आधुनिक रहते हुए हम अपराधियों को उनके मूल स्वरूप की याद दिला सकते हैं? क्या वे इस काम के लिए ही जन्मे हैं? अपराध चाहे किसी भी काल में हो कारण तो अज्ञान ही है। सामान्यतः जब आप कहेंगे की योग के द्वारा इन अपराधों से मुक्ति पाई जा सकती है तो उपहास के ही पात्र बनेंगे। तो ऐसे में किस प्रकार आप ये बातें घरों में ,विद्यालयों, गुरुकुलों में पहुँचा सकते हैं? इस पर भी समाज में चर्चा करनी चाहिए। कोरोना के इस काल में जब अधिकतर दुनिया घर में बैठी है। तो जिन उपकरणों का उपयोग अपराधी कर रहें हैं उनका उपयोग क्या हम नहीं कर सकते? क्या सोशल मीडिया इत्यादि पर हम भारत द्वारा दिखाए गए मार्ग को संपूर्ण विश्व के लिए प्रशस्त नहीं कर सकते? जब अपराधी अपने योजनाओं का कार्यान्वित कर रहे हैं तो क्या हम अपने पूरे सामर्थ्य का उपयोग नहीं कर सकते?

प्रश्न बहुत हैं और किसी दुर्घटना  के घटित हो जाने के बाद जब लूटपाट की ख़बरें आती हैं तो पीड़ा तो होती ही हैं। ये घटनाएँ केवल आज ही के युग में हो रही हैं ऐसा भी नहीं है। परंतु ये प्रयास तो करते रहना ही चाहिए कि सज्जन शक्ति असुरों से अधिक संगठित हो। इसी उद्देश्य के साथ अपना यहलेख पूर्ण करता हूँ और आशा करता हूँ कि आप घर पर भी सुरक्षित रहेंगे।

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2 Comments on “कोरोना संकटकाल में बढ़ते साइबर अपराध”

  1. लेखक ने इस लेख में वैश्विक महामारी कोरोना के कारण इंटरनेट पर बढ़ती हुई निर्भरता और उससे होने वाले अपराधों का सटीक वर्णन किया है।ज्ञातव्य है कि गत तीन चार महीनों में साइबर अपराध में अत्यधिक वृद्धि हुई है।जैसा कि लेखक ने बताया है कि बड़ी कंपनियों और उनके कर्मचारी अपने कार्य पहले ही से इंटरनेट के माध्यम से करने में सक्षम थे, परन्तु छोटे उद्योगों,कंपनियों,शिक्षण कार्य हेतु काम मे लिए जाने वाले साधनों का पूर्ण रूप से ज्ञान न होने के कारण,दूसरे शब्दों में अब तक ऑनलाइन प्रबंधन न जानने के कारण,ना तो अपने कार्य को दक्षता पूर्वक सम्पन्न कर सके,न ही अपनी गुप्त जानकारियों की गोपनीयता रख सके।
    लेखक ने ज़ूम कंपनी के कॉन्फ्रेंसिंग सॉफ्टवेयर के बारे में जो जानकारी दी है उसके बारे में भारत सरकार ने भी सबको आगाह किया है।लेखक ने ‘ऑनलाइन अपराध कैसे कैसे होते हैं ‘,इसका सारगर्भित वर्णन किया है, जो कि प्रशंसनीय है।इसमें एक स्थान पर लिखा है कि जब कोई कठिनाई होती है तो लोग गूगल पर इसका हल खोजते हैं, इसका लाभ भी कई अपराधी उठाते हैं।यह बात बहुत कम लोग जानते हैं। लेखक ने साथ ही अपराधियों से बचने के सुझाव भी बताए हैं,जो कि महत्वपूर्ण बिन्दु हैं।
    अंत में उन्होंने बहुत ही सकारात्मक संदेश दिया है कि जब अपराधी अपनी योजनाओं को कार्यान्वित कर रहे हैं तो क्या हम अपने पूरे सामर्थ्य का उपयोग नहीं कर सकते? सावधानी व सजगता से साइबर अपराध से बचा जा सकता है।
    इस प्रकार के लेख जो जानकारी व सुरक्षा प्रदान करते हैं, समय समय पर प्रकाशित होते रहने चाहिए।

    1. लेख पर अपने विचार रखने एवं प्रोत्साहन देने के लिए धन्यवाद।

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