मिशन वन्दे भारत – चुनौतियां और समाधान

एक अरब से अधिक की आबादी वाले भारत के लिए कोरोना से उत्पन्न परिस्थितियाँ किसी महायुद्ध से काम नहीं हैं, यह मूलतः एक ऐसी लड़ाई है जो अतीत में अपने दुश्मनों के साथ लड़ी गई सभी लड़ाइयों से भिन्न तो है ही, यहाँ पर पूर्व के अनुभव और शिक्षण भी बेमानी सिद्ध हो रहे हैं। प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 25 मार्च से ही एक सख्त राष्ट्रीय तालाबंदी घोषित करने का जो साहसिक,संवेदनशील तथा समझदारीपूर्ण निर्णय लिया, वह 3 मई से तीसरे चरण में प्रवेश कर गया है। हालांकि देश इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है क्योंकि उसके पास 130 करोड़ लोगों की देखभाल करने की एक बड़ी जिम्मेदारी है जिन्होंने कभी भी ऐसी आपदा का सामना तो दूर, कल्पना तक भी नहीं की थी। 
तालाबंदी के दौरान चुनौतियां
भारत सरकार तालाबंदी के दौरान जिन चुनौतियों का सामना कर रही है उनमे प्रवासी राज्यों मे कार्यरत मजदूरों का अंतरराज्यीय आवागमन और विदेशों में फंसे भारतीयों की वहाँ से निकासी, ये दो सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं। भारतीय रेलवे ने पहले से ही व्यापक अंतर्राज्यीय समन्वय के माध्यम से अन्य राज्यों मे फंसे हुए मजदूरों को अपने पैतृक राज्यों मे वापसी को सुनीशचित करने हेतु एक समग्र कार्ययोजना बना कर उस पर अमल करना शुरू कर दिया है। इसके लिए जहां एक वर्ग की ओर से सरकार पर अत्यधिक दबाव बनाया गया वहीं दूसरी ओर एक बड़ा वर्ग ऐसा भी देखने मे आया जो कि इस प्रकार से वापस जाने मे कतई भी इच्छुक नहीं था। लेकिन एक बात तो तय है कि इस प्रकार की रेलगाड़ियों से आवागमन बेहद सावधानीपूर्वक किए जाने की आवश्यकता है क्योंकि इसके माध्यम से वायरस के और अधिक प्रसार की प्रबल संभावनाएं हैं। 

विदेशों से हमारे नागरिकों की निकासी
Covid-19 के प्रसार और इसके चलते राष्ट्रीय तालाबंदी की वजह से लाखों की  तादाद मे भारतीय नागरिक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फंसे हुए हैं। इन नागरिकों की वहाँ से सुरक्षित वापसी हेतु यह दुनिया के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा अभियान होने जा रहा है। सरकार की ओर से इसमे सुरक्षा हेतु व्यापक मानदंड निर्धारित करके उनका अनुपालन सुनिश्चित किया जा रहा है। भारत सरकार और दुनिया भर में भारतीय दूतावास, ऐसे भारतीय नागरिकों को सभी संभव सहायता प्रदान कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने 7 मई से विभिन्न देशों में फंसे भारतीयों को वापस लाने के अभियान की शुरुआत भी कर दी है। इसके लिए उन नागरिकों से यह अपेक्षित है कि वे संबंधित देशों में भारतीय मिशनों के साथ विदेश मंत्रालय द्वारा निर्देशित संबंधित विवरण भर कर अपना पंजीकरण करवाएं। उन्हें नागरिक उड्डयन मंत्रालय और सैन्य मामलों के विभाग द्वारा, गैर अनुसूचित वाणिज्यिक उड़ानों एवं नौसेना के जहाजों द्वारा द्वारा भारत लाया जाएगा। इस अभियान में उन प्रवासी श्रमिकों को प्राथमिकता दी जाएगी, जिनके वहाँ पर रोजगार के अवसर बाधित हो गए हैं, जिनके वीजा की अवधि समाप्त हो गई है, जो चिकित्सकीय आपात स्थिति का सामना कर रहे हैं,जिनके परिवार मे कोई विपत्ति आ गई है इनके अलावा गर्भवती महिलाओं,बुजुर्गों,और छात्रों को प्राथमिकता दी जाएगी। सरकार केवल इन नागरिकों की निकासी तक ही अपने आप को सीमित नहीं रख सकती है, अतः नागरिकों की उचित देखभाल सुनिश्चित करने के लिए सरकार की ओर से कड़े दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं जिसमें नाम, लिंग, फोन नंबर, गंतव्य आदि जानकारी के अलावा  RT-PCR टेस्ट की जानकारी और उसके परिणाम आदि, इन नागरिकों से संबंधित ये सभी जानकारी प्रदान करनी होगी। तथा यह जानकारी, भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ अग्रिम रूप से साझा की जाएगी। विदेश मंत्रालय सभी राज्यों मे अपने नोडल अधिकारियों को नामित करेगा, जो कि संबंधित राज्य/केंद्र शासित प्रदेश सरकार के साथ इस हेतु आवश्यक समन्वय तथा परस्पर सहयोग करेंगे। स्वदेश लाए जा रहे इन नागरिकों को एक शपथ पत्र देना होगा कि वे अपने निजी खर्च पर न्यूनतम अगले 14 दिनों के लिए अनिवार्य रूप से संस्थागत स्पर्शवर्जन (Institutional Quarantine) का पालन करेंगे। यह सुनिश्चित करने के लिए कि केवल उन्ही लोगों को वापस लाया जा रहा है, जो यात्रा करने के लिए पर्याप्त रूप से फिट हैं, भारत सरकार का विदेश मंत्रालय, स्वास्थ्य प्रोटोकॉल के अनुसार एक थर्मल स्क्रीनिंग आयोजित करेगा और केवल लक्षणविहीन (asymptomatic) नागरिकों को ही यात्रा की अनुमति दी जाएगी। यह प्रोटोकॉल किसी भी मार्ग से स्वदेश लौटने वालों पर समान रूप से लागू होगा। स्वास्थ्य और व्यक्तिगत विवरण तथा स्वघोषणा पत्र सभी यात्रियों द्वारा अग्रिम रूप से भरा जाएगा तथा इसकी प्रति आगमन स्थल पर स्वास्थ्य और आव्रजन अधिकारियों को दी जाएगी। पूरी यात्रा के दौरान MoCA / DMA के स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया जाएगा। आगमन पर पुनः विस्तृत स्वास्थ्य प्रोटोकॉल के अनुसार मौजूद स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा थर्मल स्क्रीनिंग की जाएगी जिन यात्रियों Covid-19 के लक्षण पाए जाएंगे, उन्हें तुरंत स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधाएं प्रदान की जाएंगी, जबकि अन्य को संबंधित राज्य/केंद्र शासित प्रदेश सरकार द्वारा निर्धारित संस्थागत स्पर्शवर्जन (Institutional Quarantine) सुविधाओं में ले जाया जाएगा। प्रशासन की ओर से यथासंभव यह प्रयास किए जा रहे हैं कि सुविधाएं जिला मुख्यालय पर स्थापित की जाएं। इस पूरे अभ्यास मे सबसे महत्वपूर्ण कारक यात्रियों की 14 दिनों की संस्थागत स्पर्शवर्जन (Institutional Quarantine) का है, जिसके माध्यम से महामारी के प्रसार को प्रभावी ढंग से रोका जा सकेगा। नॉवेल कोरोना वायरस के बदलते स्वरूप के कारण 14 दिनों के बाद यात्रियों का एक परीक्षण किया जाएगा और नकारात्मक परिणाम आने पर, उन्हें घर जाने की अनुमति दी जाएगी और प्रोटोकॉल के अनुसार 14 और दिनों के लिए अपने स्वास्थ्य की स्व-निगरानी करनी होगी। 
 
प्रवासियों का आगमन, चुनौतियां और भविष्य 
1970 के दशक के दौरान,अंतर्राष्ट्रीय बाजार मे तेल की कीमतों मे उछाल की वजह से खाड़ी के देशों में पलायन शुरू हुआ था,जिसने कई रंक से राजा बनने वाली कहानियों को जन्म दिया था। इससे प्रेरित होकर कई भारतीयों ने अपने सपनों को पूरा करने के लिए खाड़ी देशों की ओर रुख किया। कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब, यूएई, ओमान, कतर आदि खाड़ी के देशों मे आप्रवासी भारतीय आबादी लगभग 90 लाख से भी अधिक है,उनमें से व्यथित लोगों को ही स्वदेश वापस लाया जाएगा। दक्षिणी राज्यों केरल,तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश,बिहार और गुजरात के भी खाड़ी क्षेत्र में काम करने वाले काफी आप्रवासी हैं,ये हमारे देश में विदेशी मुद्रा के एक बड़े स्त्रोत हैं। जो कि अचानक नौकरी छूट जाने और मेजबान राष्ट्रों में (जोकि स्वयं Covid-19 के खतरे को झेल रहे हैं) पुनर्गठन के कारण प्रभावित हो सकता है। इसमे से भी अधिक चिंता अर्ध-कुशल और अकुशल मजदूरों के लिए हैं क्योंकि इस समय संकट से प्रभावित होने की उनकी संभावना सबसे प्रबल है। वे पहले से ही अवैतनिक सेवा और विलंबित वेतन जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं,नई भर्ती में गिरावट,आर्थिक अस्तित्व को बहुत मुश्किल बना सकती है। अधिकांश श्रमिक अकुशल क्षेत्र में हैं,जो निर्माण स्थलों और ऐसे क्षेत्रों में हैं,जिनमें वहाँ के मूल निवासी काम करने में हिचकिचाते हैं। कई लोग श्रमजीवी,दुकान सहायक,और खेतिहर मजदूर के रूप में काम कर रहे हैं। अर्ध-कुशल श्रम में ड्राइवर, शिल्पकार और अन्य तकनीकी कार्य शामिल हैं। खाड़ी देशों को एक विश्वसनीय कार्यबल की आवश्यकता है, जो कि ये आप्रवासी पूरी करते हैं। इसके परिणामस्वरूप हमारे लाखों नागरिकों की आर्थिक दशा में सकारात्मक परिवर्तन आया है। खाड़ी देशों में उनके संक्षिप्त कार्यकाल के बाद ही जीवन में परिलक्षित परिवर्तन को देखकर उनके सहकर्मियों और रिश्तेदारों को भी अपने जीवन को बेहतर बनाने की इच्छा से इन देशों में अपनी किस्मत आजमाने के लिए प्रेरित किया। तेल समृद्ध देशों में अकुशल श्रमिकों ने कठोर परिश्रम के बल पर अपने जीवन में तेजी से सुधार सुनिश्चित किया,जिससे कि स्वदेश मे इनके परिवारजनों और आश्रितों को बेहतर आवास,स्वास्थ्य देखभाल,और शिक्षा सुविधाएं मुहैया हो पायीं। अन्यथा ऐसे लोगों तक पहुँचने में और उनके जीवन मे गुणात्मक सुधार मे काफी समय लग सकता था जो गरीबी में फंसे हुए थे। लेकिन कार्यबल के लिए आप्रवासी श्रमिकों पर खाड़ी के देशों की निर्भरता ने श्रमिकों के मूल वतन मे भी जीवन शैली मे गुणात्मक सुधार मे एक अहम योगदान दिया। 2005-06 में प्रवासियों से करीब $24 बिलियन की विदेशी मुद्रा का अर्जन उनकी उपस्थिति की सामूहिक ताकत को दर्शाता है और विदेशों में उनकी उत्पादक क्षमता को भी दर्शाता है। यह वर्तमान निकासी पूर्व की युद्धकालीन निकासी से पूर्ण रूप से भिन्न है, यह एक खतरनाक महामारी के समय में सबसे जोखिम भरी निकासी है, लेकिन इन सबके बावजूद राष्ट्र पूरी तरह से अपने नागरिकों को स्वीकार करने में और उनकी समुचित देखभाल करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। भारत सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने  नागरिकों के प्रति संवेदनशील है और सरकार ने अपने प्रयासों मे बिना किसी भय या पक्षपात के अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया है। दरसल,यह समस्या एक उचित निकासी के साथ समाप्त नहीं होती है,अपितु इससे आगे क्या मार्ग होगा यह तय कर पाना और भी अधिक चुनौतीपूर्ण है। जो लोग स्वदेश लौट रहे हैं, आज उन्हे अपने देश मे आत्मसात करने की आवश्यकता है। यहाँ यह विशेष रूप से देखा जाना चाहिए कि जिन लोगों ने खाली हाथ राष्ट्र को छोड़ा था,इस दौरान विदेश मे कार्य करते समय उन्होंने निश्चित रूप से अपनी क्षमताओं के बल पर विदेश में बहुत कुछ योगदान दिया है। अब यदि उनके लिए विदेश मे अवसर नहीं है,तो उनके कौशल का सदुपयोग अपने देश की उत्पादकता तथा उत्पादन मे लिया जाना चाहिए। कई लोगों को स्थानीय आर्थिक व्यवस्था में समायोजित होने के लिए एक उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता हो सकती है। सरकार से यह भी अपेक्षा है कि स्थिति सामान्य होने के साथ-साथ उन्हें अवसरों और रास्तों से अवगत कराये,क्योंकि वैसे भी तालाबंदी के बाद अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की एक बड़ी जिम्मेदारी सरकार की है ही,उस नई व्यवस्था मे किसी भी प्रकार से इन अकुशल एवं अर्धकुशल आप्रवासी श्रमिकों की समुचित व्यवस्था करना एक महत्वपूर्ण विषय रहेगा। बहुत से ऐसे भी लोग होंगे जो अपनी अर्जित बचत के साथ छोटे-मोटे आर्थिक उद्यम खोलने में सक्षम होंगे,उनके लिए यही अपेक्षा है कि संबंधित स्थानीय सरकार इसके लिए एक उचित वातावरण तैयार करे।  
इस महामारी के साथ संघर्ष मे एक और महत्वपूर्ण बिन्दु हमारा ध्यान आकर्षित करता है वह है एक राज्य से दूसरे राज्य में विशाल संख्या में प्रवासी श्रमिकों का आवागमन। बदले हुए हालातों में इनमें से कई मजदूर अपने गांवों में वापस जाने का विकल्प चुन रहे हैं और अकुशल प्रवासी विदेश में अपनी नौकरी गंवाने के बाद स्वदेश वापस लौट रहे हैं,यदि उचित मार्गदर्शन प्रदान किया जाए और मनोवैज्ञानिक ढंग से इस समस्या का समाधान किया जाए तो स्वदेश लौटने वाले श्रमिक अपने गृह राज्य मे ही अपनी सेवाओं का निस्तारण कर सकते हैं। इस प्रकार से संबंधित राज्य अपने यहाँ की खोयी हुयी श्रमशक्ति को पुनः अर्जित कर सकते हैं। विदेशों में कौशल अर्जित कर स्वदेश लौटे श्रमिकों की क्षमताओं को राज्यों द्वारा प्रभावी ढंग से सदुपयोग करने की अपार संभावनाएं हैं। इसके लिए राज्य सरकारें एकीकृत एवं समेकित रूप से सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रदान कर सकती हैं। अपने नागरिकों की दक्षता, कुशलता और भावी संभावनाओं को ध्यान मे रखते हुए संबंधित क्षेत्र का उचित वर्गीकरण किया जाना चाहिए। यदि स्वास्थ्य क्षेत्र से संबंधित लोगों जैसे कि पैरामेडिक्स और नर्सें यदि लौटती हैं, तो उन्हें महामारी की लड़ाई का हिस्सा बनने का अवसर दिया जाना चाहिए, यह एक प्रकार से वरदान साबित हो सकता है क्योंकि हम पहले से इस क्षेत्र के लोगों की कमी से जूझ रहे हैं। आप्रवासियों में से कई विदेश में अर्जित कमाई की बदौलत आज भू-स्वामी बन गए हैं उन्हें खेती की ओर प्रोत्साहित किया जा सकता है,जोकि  आजीविका सुनिश्चित करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर परिवार की इकाइयों के लक्ष्य को सुनिश्चित करने मे भी सहयोगी सिद्ध  होगा,यह विशेष रूप से एक महामारी के बाद जो खाद्यसंकट की आशंकाओं को दूर कर सकेगा। जैसी कि पहले भी चर्चा की गई है,जो भी व्यक्ति नए व्यवसायों में निवेश करने की स्थिति में हैं,उन्हें पूरी तरह से आश्वस्त किया जाना चाहिए कि उन्हे जटिल आधिकारिक औपचारिकताओं के नाम पर हैरान-परेशान नहीं किया जाएगा।
इस प्रकार से संकट की इस घड़ी मे हम सबको सदैव यह याद रखना चाहिए कि सफलता उन्हें ही प्राप्त होती है जो प्रतिकूलताओं मे भी अवसर तलाशने की क्षमता रखते हैं,और इसी आधार पर हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि इस अज्ञात और अद्रश्य शत्रु के खिलाफ महायुद्ध में भी हम विजयी होकर निकलेंगे।   
 

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