भारत : एक उदीयमान वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व

विश्वव्यापी आपदा कोरोना के प्रकोप को कम करने में अग्रिम नियोजन और तत्परता की अहम् भूमिका है।  भारत कोविड- 19 का सामना ‘समूह रोकथाम कार्ययोजना’ (Cluster Containment Strategy) के साथ कर रहा है, जिसमें इस संक्रमण को एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र तक ही थामकर, प्राथमिक स्तर पर ही रोग के लक्षणों को पहचानकर और रोग के संक्रमण की श्रृंखला को तोडकर उसके विस्तार पर अंकुश लगाया जाता है।  इस कार्ययोजना को सम्पूर्ण देश में बड़े उत्साह से अपनाया गया और इसे एक जन आन्दोलन बनाया गया, जिसका सकारात्मक प्रभाव देखा जा सकता है।  क्योंकि कोविड -19, अतिसंक्रामक रोग है अतः इसकी कार्यशैली को समझना अति आवश्यक है।  पूरी दुनिया में केवल सामाजिक दूरी (Social Distancing) और लॉक डाउन ही इसका सफल उपाय रहे हैं।   

एक राष्ट्र के रूप में भारत ने इन दोनों उपायों को देश के प्रधानमंत्री  के सुयोग्य नेतृत्व में अपनाया।  जो इस महानतम सामाजिक अभियान की अगुआई बिलकुल नाविन्यपूर्ण तरीके से तथा जोश के साथ युद्ध स्तर पर कर रहे हैं।  उन्होंने प्रभावी रूप से नागरिकों से संवाद साधते हुए देश का मनोबल बढ़ाए रखा है।  कोविड -19 के विरुद्ध लड़ाई केवल किसी एक व्यक्ति का या केवल स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की या केवल चिकित्सा क्षेत्र का ही कार्य नहीं है।  सम्पूर्ण राष्ट्र को इसके विरुद्ध जागरुकता से लड़ना होगा जो कि भारत ने पूरी दुनिया को कर दिखाया है।  यह संभव हुआ है केवल केंद्र सरकार द्वारा समय पर लॉक डाउन का निर्णय लेने से तथा सामाजिक दूरी बनाए रखने का अभियान चलाने से। स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ ही भारत सरकार, अन्य सभी मंत्रालय और उनकी एजेंसियां, गैर-सरकारी संगठन और देश भर में कार्यरत अनेक स्वयंसेवक इस वायरस के संक्रमण को समाप्त करने के लिए दृढ़ता से अनवरत रूप से लगे हुए हैं।        

भारत सरकार द्वारा कोविड –19 आपातकालीन प्रतिक्रिया तथा स्वास्थ्य प्रणाली प्रबंध पैकेज 15,000 करोड  बनाया गया (इनमे से तत्काल उपयोग के लिए 7,774 करोड की राशि जारी कर दी गई है) जो कि राज्य सरकारों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को तीन चरणों में बांटा जाएगा  (जनवरी 2020 से जून 2020, जुलाई 2020 से मार्च 2021 और अप्रैल 2021 से मार्च 2024 तक)।   यह निधि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के क्षेत्रफल तथा उन में पाए गए कोविड पॉजिटिव मामलों को आधार बनाकर दी जाएगी।  राज्य सरकारें इस निधि से कोविड -19 रोगियों के लिए नए अस्पतालों का निर्माण कर सकेंगी।  यह राशि  व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, प्रयोगशालाओं का निर्माण, आवश्यक वैद्कीय उपकरण, दवाईयां तथा कोविड रोगियों के लिए अन्य उपयोगी सामग्री को खरीदने में व्यय हो सकेगी।  इसके साथ ही भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद तथा इसी प्रकार के भारत के अन्य प्रमुख संस्थान, कोविड -19 का टीका (Vaccine) विकसित करने में लगे हुए हैं ताकि बड़े पैमाने पर टीकाकरण द्वारा भी इस जानलेवा वायरस के प्रसार पर रोक लगाई जा सके।  

लॉक डाउन से मिली सीख :

1          भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को कोविड-19 की आपदा पश्चात् भी इस भावना को बनाए रखकर देश में पूरे साल स्वास्थ्य-स्थिति का निरिक्षण करना होगा तथा राज्य सरकारों को स्वास्थ्य संबंधित सभी मामलों में मार्गदर्शन देना होगा।

2          सरकार को निवारक स्वास्थ्य देखभाल तथा सकारात्मक स्वास्थ्य संवर्धन पर अधिक ध्यान देना होगा।  

यह तभी संभव होगा जब विद्यमान प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाएगा, आने वाले समय में आंगनवाड़ी, आशा तथा अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के साथ में इस निर्दिष्ट प्रणाली को राज्यस्तर की तृतीयक सेवा व्यवस्था तक पहुंचाया जाएगा।  सरकार को अखिल भारतीय स्तर पर स्वास्थ्य समितिओं के मानदंड को पूरा करने के लिए समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित करने चाहिएं, अच्छा संप्रेषण, दायित्व प्रत्यायोजन, पारदर्शिता, जवाबदेही इत्यादि इसके साधन हैं।  सरल तकनिकी का प्रयोग इसका समाधान है।

3          कोविड-19 की आपदा का प्रबंधन सरकार हर तरह से अपनी एजेंसियों को सशक्त बनाकर करने में सफल रही है।  कदाचित ही सरकार ने किसी निजी स्वास्थ्य सेवा संस्थान का सहयोग इसमें लिया होगा।  वरना निजी स्वास्थ्य संस्थान जो कि अपने उच्च मानकों के लिए जाने जाते हैं, लागत में काफी खर्चीले होते हैं।  इससे सरकारी तथा निजी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को पुनर्गठित किए जाने की आवश्यकता का पता चलता है।  उन्हें स्वास्थ्य देखभाल, स्वास्थ्य रिकॉर्ड की संभाल तथा जनसंख्या का काल आदि के समान मानकों के साथ एक ही छत के नीचे लाया जाना चाहिए।  यह रोग द्वारा समाज में पड़ने वाले वास्तविक बोझ का पता लगाने में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।  

4          प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, निवारक स्वास्थ्य देखभाल, सकारात्मक स्वास्थ्य संवर्धन, महामारी विज्ञान, स्वास्थ्य आसूचना (Health Intelligence),स्वास्थ्य शिक्षा और अनुसंधान, स्वास्थ्य परिक्षण,स्वास्थ्य सांख्यिकी, सामाजिक स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन आदि विभागों को एक ही छत के नीचे होना चाहिए जिससे उनमें ज्ञान और अनुसन्धान का आदान-प्रदान हो सके ताकि सामान्य व्यक्तियों तक उच्चतम स्वास्थ्य सेवा पहुंचाई जा सके।  और ऐसे सभी विभागों के कार्यालय जिला स्तर पर भी हों जिनके पास पारदर्शिता और जवाबदेही युक्त उत्तम सूचना-प्रेषण प्रणाली हो क्योंकि केवल यह प्रणाली ही भविष्य की आनेवाली महामारियों पर अंकुश लगा सकती है।  निवारक स्वास्थ्य देखभाल को बनाए रखने के लिए यह निवेश करने योग्य है।  

5।         कोविड-19 से लड़ने में योग, आयुर्वेद तथा होम्योपैथी (आयुष) के वैज्ञानिक शोधों द्वारा प्रमाणित – रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाने वाली नवीन चिकित्सीय पद्धति के महान योगदान को कम नहीं आंका जा सकता।  आयुष प्रणाली तथा एलोपैथी को संयुक्त रूप से एक-दूसरे से सामंजस्य रखते हुए कार्य करना चाहिए।  हमारे प्रधानमंत्री ने भी इसकी आवश्यकता पर कई बार बल दिया है।  आयुष प्रणाली तथा एलोपैथी को एक-दूसरे की पूरक बनना होगा ना कि प्रतिस्पर्धी।  उच्चस्तरीय हस्तक्षेप से इन दोनों विभागों को एकीकृत करना होगा ताकि दोनों से ही उत्तम परिणाम प्राप्त किए जा सकें।  स्वच्छ राजनीति तथा तथ्यों पर आधारित स्वस्थ आलोचना के माध्यम से हम इस व्यवस्था को सुचारू ढंग से चला पाएंगे और यही नई रीत होनी चाहिए।

6          सरकार को चाहिए कि स्वास्थ्य संरचनाओं में अपनी स्थायी परिसंपत्ति बनाए, जैसे –

  1. शिक्षा तथा शोध चिकित्सालयों का उपयोग उनके निर्दिष्ट कार्यों के लिए ही हो।  
  2. अत्याधुनिक अनुसंधान एवं प्रयोग शालाओं की स्थापना।  
  3. शिक्षण, शोध तथा चिकित्सकीय विभागों को पृथक रखा जाए एवं उचित प्रोत्साहन के द्वारा उन्हें विकसित किया जाए।  
  4. स्वास्थ्य के लिए एक अलग बजट हो तथा उसका प्रमुख भाग निवारक और सकारात्मक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में खर्च हो।  
  5. दवा तथा वैद्कीय उपकरण के सभी निर्माताओं के लिए वैश्विक मानक निर्धारित किए जाएं क्योंकि स्वास्थ्य सेवा के मानकों के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता साथ ही किसी की आर्थिक स्थिति को आधार बनाकर पक्षपात नहीं किया जा सकता।   
  6. सभी स्तरों के स्वास्थ्य विभागों को संभालने के लिए भारतीय वैद्कीय सेवाओं की नियुक्ति हो।  कोई भी नई स्वास्थ्य नीति या योजना, नीति आयोग तथा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आई। सी। एम। आर) द्वारा स्वीकृत किए जाने के बाद ही देश में लागू की जाए।  इसी तरह, किसी भी प्रकार की नई दवा या उपचार, भारतीय शोध संस्थानों द्वारा जांचने-परखने और स्वीकृत किए जाने के उपरान्त ही देश में जारी की जाए।  
  7. स्वास्थ्य डेटा तथा आंकड़ों का सतत संकलन होता रहे तथा निजी अस्पतालों को भी इस में कोई छूट ना हो।   

7          लॉक डाउन के कारण बाह्य रुग्ण विभाग में परामर्श के लिए आने वाले रोगियों की संख्या, अनावश्यक स्वास्थ्य जांच-पड़ताल एवं औषधोपचार तथा कुल मृत्यु-दर, इन तीनों में आई कमी पर केन्द्रीय स्तर के शोध संस्थानों द्वारा अन्वेषण किया जाना आवश्यक है।  इस अनुसंधान से प्राप्त परिणामों को कोविड-19 पश्चात् के काल में सम्पूर्ण देश में दृढ़ता से लागू कराया जाए ताकि हम एक बेहतर और स्वस्थ राष्ट्र बना सकें।         

8          स्वास्थ्य योजनाओं का उचित पालन करवाने में अच्छे संवाद माध्यम, दायित्व प्रत्यायोजन, पारदर्शिता, दृढ़ता आदि साधनों का उपयोग होना चाहिए।  सरल तकनिकी का प्रयोग इसका उपाय है।

अतिप्राचीन काल से ही भारतवर्ष और इसके वासी विश्व बंधुत्व और विश्व शांति की संकल्पना में जीते आए हैं।  जब भी आवश्यकता पड़ी है, भारत ने विश्व को मार्ग दिखलाया है।  सन् 1893 में भारत के एक जोशीले सन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो की विश्व धर्म परिषद में इसी भारतीय विश्व बंधुत्व के दर्शन पूरी दुनिया को करवाए।  सन् 2015 में नवयुगीन वैश्विक नेता तथा भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र परिषद में वैश्विक स्वास्थ्य के लिए प्रतिवर्ष 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा।  

अन्य देशों की तरह भारत में कोविड –19 के विरुद्ध लड़ाई इतनी दुष्कर नहीं हुई, क्योंकि यहां सम्पूर्ण समाज ही इस लड़ाई के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है, स्वेच्छा से लॉकडाउन और सामाजिक दूरी का पालन कर रहा है।  यद्यपि सरकार और उसकी एजेंसियां अपनी ओर से पूरा प्रयास कर रही हैं, परन्तु काफी हद तक इसकी सफलता का श्रेय लोगों के सम्पूर्ण सहभाग तथा स्वेच्छा से बड़े पैमाने पर मदद करने को जाता है क्योंकि निकट भविष्य में इस आपदा का कोई निश्चित इलाज या वैक्सीन बनती दिखाई नहीं दे रही है।  

यही कारण है कि इस आपदा के आरम्भ में भारत के पास अल्प वैद्कीय संरचना के होते हुए भी भारत इस स्थिति को अपेक्षाकृत और उससे भी अधिक अच्छी तरह से संभाल पाया है तथा कई जीवन बचाते हुए इसके बढ़ते हुए ग्राफ को रोकने में सफल रहा है।  साथ ही कई देशों में दवाई तथा अन्य सुविधाओं को भी उपलब्ध करा पाया है।  समस्या की गंभीरता तथा वर्तमान वैद्यकीय शास्त्र की परिमितता को देखते हुए सरकार को चाहिए कि नीति निर्धारकों, वैद्कीय शोध संस्थानों तथा विभिन्न क्षेत्रों से चिकित्सक समुदाय जिसमें ‘आयुष’ भी शामिल है – इन्हें एक बड़ा मंच उपलब्ध करवाए ताकि सूक्ष्म निरिक्षण और ज्ञान का आदान-प्रदान संभव हो तथा मनुष्यजाति के कल्याण हेतु बेहतर उपाय योजना बन सके।  

रोकथाम इलाज से सदा ही बेहतर है।  अतएव प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।  और उनमें मूलभूत विशेष सुविधाएं जैसे आयुष, महामारी विज्ञान और ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य का सकारात्मक प्रचार-प्रसार इत्यादि भी सम्मिलित होना चाहिए।  इससे समाज में किसी भी आपदा से उभरने की क्षमता निर्माण होगी।  साथ ही, स्वदेशी वैद्कीय अनुसन्धान तथा औषध निर्माण संस्थाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।  

सारे देश में निजी तथा सार्वजानिक दोनों क्षेत्रों में पूरी प्रमाणिकता से वास्तविक स्वास्थ्य डेटा का संकलन किया जाना आवश्यक है तथा केन्द्रीय शोध संस्थानों को भी यह डेटा उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।  भविष्य में स्वास्थ्य आसूचना (Health Intelligence) तथा भारतीय वैद्कीय सेवाओं का प्रबंधन किया जाए ताकि बेहतर नीतियां बन सकें तथा रोगों के स्वरुप की विश्वस्त्रीय जांच एवं रोग नियंत्रण हो सके।   

कोविड –19 के उपरान्त जीवन पहले की तरह नहीं रह जाएगा, इस आपदा ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है।  जिसमें – शिक्षा, व्यवसाय, उद्योग, अर्थ व्यवस्था और जीवन शैली शामिल हैं।  अब समय आ गया है कि हम अपने जीवन की प्राथमिकताओं और लक्ष्यों को पुनः निर्धारित करें।  कोविड –19 के पश्चात् उत्पन्न एक बड़ी चुनौती का सामना कोविड जीवन शैली के माध्यम से करें।  

जीवन कई बार दुष्कर प्रतीत होता है परन्तु हमारे द्वारा उचित दिशा का चुनाव ही हमारा भविष्य निर्धारित करेगा।

 सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।

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