15 August:जानिये,भगत सिंह के उस साथी की कहानी जिसने डाला उनके साथ असेम्बली में बम-

आज हम बात करेंगे आजादी के दीवाने भगत सिंह सुखदेव तथा राजगुरु के अटूट साथी रहे बटुकेश्वर दत्त की
यह वही बटुकेश्वर दत्त हैं जिन्होंने भगत सिंह के साथ मिलकर उस समय असेंबली में बम फेंका था। भगत सिंह पर तो पुख्ता आरोप थे इसलिए उन्हें फांसी की सजा हुई लेकिन बटुकेश्वर दत्त आजीवन कारावास के लिए काला पानी अंडमान निकोबार भेज दिया गया। आज “सीमा संघोष” आपके लिए लेकर आया है इतिहास के पन्नों में छुपे योद्धा का पूरा जीवन परिचय।

महान स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त को आजाद भारत में वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वह अधिकारी थे। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, भगवती चरण वोहरा, राजगुरु व सुखदेव के अभिन्न साथी रहे इस महान क्रांतिकारी को आजाद भारत में अपमान, उपेक्षा, यातनाओ कड़वे दंश झेलने पड़े। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के दौरान 16 साल की उम्र में बटुकेश्वर कानपुर में भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आए और जल्द ही क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सश्क्त सदस्य बन गए।

1933 और 1937 में उन्होंने जेल में नृशंस अत्याचारों को लेकर दो बार भूख हड़ताल भी की थी। जब वे वापस आये तो उन्हें टीबी के रोग ने जकड़ रखा था।अखबारों में खबर छपी तो 1937 में उन्हें फिर कैद कर बिहार के बांकीपुर केंद्रीय जेल में डाल दिया गया। एक साल बाद रिहा हुए तो उनके सारे साथी दुनिया से जा चुके थे। पहले उन्होंने इलाज करवाया, दूसरी बार मौत को चकमा देकर दत्त ने फिर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया। एक बार फिर गिरफ्तार हुए और 1945 में जेल से रिहाई मिली तो आमजन के बीच स्वदेशी की अलख जगाने में जुट गए।

1947 में देश आजाद होने के बाद बटुकेश्वर दत्त ने शादी कर जीवन की नई पारी शुरू की, लेकिन आजीविका के लिए “उन्हें सिगरेट बेचने से लेकर बिस्कुट-डबलरोटी की छोटी-सी बेकरी खोली”। धंधे में ईमानदारी रास नहीं आई और वे घाटे में आ गए। उन्होंने टूरिस्ट एजेंट और बस कंडक्टर का काम भी किया।

1964 में जब दत्त बीमार हुए तो उन्हें पटना के एक अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा इसकी खबर उनके पत्रकार मित्र चमनलाल जी को लगी तो उन्होंने यू लेख लिख डाला ‘‘क्या दत्त जैसे क्रांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए! खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है।’’ इस लेख से सत्ता के आंगन में हड़कंप मच गया।

जाने श्री दत्त की क्या थी आखरी इच्छा

बेहतर इलाज के लिए उन्हें दिल्ली लाया गया। दिल्ली पहुंचने पर दत्त ने पत्रकारों से कहा, ‘‘मुझे स्वप्न में भी ख्याल न था कि मैं उस दिल्ली में जहां मैंने बम डाला था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाऊंगा।’’ पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन वहां पहुचे उनके हाल लिए तो इस पर छलछलाई आंखों से दत्त ने कहा, मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।’’ 20 जुलाई, 1965 को बटुकेश्वर दत्त दुनिया से विदाई ली। ऐसे संघर्षपूर्ण जीवन को आज “सीमा संघोष” के साथ सम्पूर्ण भारत कोटि कोटि नमन करता है।

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