15 August :जानिए कौन था बाघ जैसे साहस वाला क्रांतिकारी “बाघा जतिन”-

भारत माता को अंग्रेजों की बेड़ियों से मुक्त कराने में कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान था जिनको इतिहास के पन्नों में कहीं दबा दिया गया, जतीन्द्र नाथ मुखर्जी को भी इतिहास के इस दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है, कई इतिहासकार ऐसे भ्रम को फैलाने में आज भी कमी नहीं रखते कि “देश को आजादी मिली बिना खडक बिना ढाल” लेकिन इतिहास के पन्नों को खंगाला जाए तो यह गीत सत्य की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, हमारी सोने की चिड़िया को जिन अंग्रेजों ने कैद किया हुआ था उसको आजाद कराने के लिए अनेकों रणबांकुरो ने अपने प्राणों की आहुति लगा दी थी, आजादी के दीवाने श्री जतिंद्रनाथ मुखर्जी भी उन्ही वीरों में से एक है।

स्वतंत्रता सेनानी श्री जतिंद्रनाथ मुखर्जी का जन्म जैसोल जिले के कायाग्राम में हुआ। बचपन में यह पिता का हाथ सिर से उठ गया तो माँ ने बड़ी कठिनाइयों से उनका लालन-पालन किया समय के साथ जतिंद्र बड़े हुए बलिष्ठ देह के धनी जतिन बाल्यकाल से ही साहसी थे। उन्होंने 18 वर्ष की आयु में मैट्रिक की परीक्षा पूरी कर ली फिर परिवार के जीवन उपार्जन के लिए कोलकाता विश्वविद्यालय से जुड़ गए थे।

बलिष्ठ शरीर के स्वामी तो स्वभाव से जोशीले जतिंद्रनाथ एक बार जंगल से गुजर रहे थे तो उनका सामना एक भाग से हुआ, बाघ बड़ा ही खूंखार था लेकिन नाथ भी कुछ कम साहसी न थे उन्होंने अन्यों की तरफ भागने की बजाय बाघ का निडरता से सामना किया और अपने हसिये से उस बाघ को मार डाला,तब से उनका उपनाम “बाघा जतिन” हो गया।

कुटिल अंग्रेजों ने उस समय बंग-भंग की योजना बना रखी थी, जगह जितेंद्र को इस बात की खबर मिली तो आजादी का सपना देखने वाले मुखर्जी की रक्त शिराओं में उबलता खून और ज्यादा उफाल लेने लगा। वे अंग्रेजों की नौकरी को लात मारकर आजादी के आंदोलन की राह पर चल पड़े। 1910 में एक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ने के पश्चात उन्हें हावड़ा षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कर एक साल की सजा सुनाई गई।

जेल से छूटने के बाद वह अनुशीलन समिति के सदस्य बने और सक्रिय भूमिका निभाते हुए,अपना कार्यभार संभाला। इस दौरान अंग्रेजी पुलिस कि उन पर कड़ी निगाहें थी और 7 सितंबर 1915 में पुलिस को उनके अंडे का पता लग चुका था। जतिन बाबू अपने साथियों के साथ वहां से निकल गए थे लेकिन राज महंती नामक एक अफसर ने गांव के लोगों की मदद से उन्हें पकड़ने की कोशिश की थी वहां पर ज्यादा भीड़ होने के कारण भीड़ को तितर-बितर करने के लिए जतिंद्रनाथ ने गोली चला दी और राज महंती वहीं मर गया।

यह समाचार आग की तरह फैल गया और बालासोर के जिला मजिस्ट्रेट किल्वी तक इसकी सूचना गई तो मजिस्ट्रेट वहां पर पूर्ण तैयारी के साथ पहुंच गए एक क्रांतिकारी वहां पर बीमार था जितेंद्र उसको छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं थे। वहां पर दोनों तरफ से गोलियां चलने लगी तो चित्रप्रिय नामक एक क्रांतिकारी वही शहीद हो गया। 2 साथी क्रांतिकारियों ने वहां पर मोर्चा संभाला लेकिन इस बीच जितेंद्र का पूरा शरीर गोलियों से छल्ली हो चुका था। उन्हें वहां से अस्पताल ले जाया गया,लेकिन अगले ही दिन वह वीर शिरोमणि भारत माता की गोद मे हमेशा के लिए सो गए। ऐसे वीरों को आज संपूर्ण भारतवर्ष कोटीश: नमन करता है।

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