जानें, राजस्थान के महान क्रांतिकारी और कवि केसरी सिंह बाहरठ की अनुपम जीवनी-

 " प्रजा केवल पैसा ढालने की प्यारी मशीन है 
 और शासन उन पैसों को उठा लेने का यंत्र " 
 शासन शैली ना पुरानी ही रही ना नवीन बनी, 
     न वैसी एकाधिपत्य सत्ता ही रही न पूरी ब्यूरोक्रेसी ही बनी। अग्नि को चादर से ढकना भ्रम है -खेल है- या छल है"    
                                 "केसरी सिंह बाहरठ" द्वारा रचित

महान क्रांतिकारी केसरी सिंह बाहरठ एक महान कवि होने के साथ-साथ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी भी रहे। राजस्थान राज्य के चारण समुदाय में जन्मे केसरी सिंह बाल्यकाल से ही देश भक्ति के रंग से ओतप्रोत थे। उनके बेटे प्रताप सिंह बाहरठ को राजस्थान का चंद्रशेखर आजाद भी कहते हैं । उन्होंने अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया था। 14 अगस्त 1941 में उनका बीमारी के कारण निधन हो गया। आइए जानते हैं इस महान क्रांतिकारी की जीवनी-

केसरी सिंह भारत का जन्म 21 नवंबर 1872 में राजस्थान में शाहपुरा रियासत के देव खेड़ा नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कृष्ण सिंह बाहरठ था एवम माता श्री बख्तावर कवर थी।जिनका निधन केशरी सिंह के बाल्यकाल में ही होगया। माँ का सिर से हाथ उठने के बाद उनकी दादी ने उनका लालन पालन किया।

जब उनकी आयु 6 वर्ष थी तभी से उनको शाहपुरा के महंत श्री सीताराम की देखरेख में शिक्षा शुरू करवा दी गई। 8 वर्ष की आयु में उनके पिता ने काशी के विद्वान पंडित गोपीनाथ शास्त्री को उदयपुर से बुलवाकर उनकी सुनियोजित ढंग से शिक्षा शुरू करवाई। शुरुआती शिक्षा संस्कृत में हुई जिससे आगे चलकर के केसरी ने “अमरकोश “कंठस्थ करे लिया था। इसके साथ साथ उनको भारतीय अन्य भाषाओं जैसे बंगाली, गुजराती,मराठी का भी पर्याप्त अध्ययन किया आगे चलकर उनको ज्योतिषी,गणित तथा भूगोल में भी महारत हासिल हुई।

स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी-

ठाकुर केसरी सिंह बाहरठ, को 1903 में जब उदयपुर के राजा फतेह सिंह को अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड कर्जन द्वारा आयोजित बैठक में आमंत्रण मिला तो उनको रोकने के लिए उन्होंने अपने कलम का उपयोग किया और “चेतावनी रा चुंगट्या” नामक 16 सोरठे लिखे।

इसके बाद उन्होंने अनेकों क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया तथा बहुत से क्रांतिकारियों को शस्त्र उपलब्ध कराने जैसे मदद की, केसरी सिंह का उस समय के प्रमुख रासबिहारी बोस,मास्टर अमरिंदर चंद आदि से घनिष्ठ संबंध रहा था। सन 1912 में जब ब्रिटिशी सी.आई.डी ने राजपूताना में चुनिंदा क्रांतिकारियों की सूची बनाई तो उनमें प्रमुख नाम केसरी सिंह बाहरठ का भी था।

शाहपुरा के राजा नागर सिंह की मदद से मार्च 1914 में उन को बंदी बना लिया गया। जिसमें उनपर मनगढ़ंत आरोप लगाकर उनको 10 वर्ष की सजा सुना दी गई। जिसके बाद उनको बिहार के हजारीबाग जेल में डाल दिया गया।

जेल में रहते हुए उन्होंने एक नई मिश्रित सैन्य कलाअपने अंदर विकसित की जिसे चमवाई भी कहते हैं। जेल से मुक्ति के उपरांत उन्होंने अनेकों कविताएं लिखि। उन्होंने आबू के गवर्नर जनरल को एक पत्र लिखा। जिसमें उन्होंने भारत की रियासत तथा राजस्थान आगामी सरकार की योजना प्रस्तुत की थी ।

सेठ जमनालाल बजाज के बुलावे पर है सन 1920 में वर्धा चले गए। वहा पर उन्होंने “राजस्थान केसरी” नामक साप्ताहिक पुस्तिका निकालना प्रारंभ किया। वहीं पर केसरी सिंह महात्मा गांधी के भी संपर्क में आए।
चन्द्रधर शर्मा, रव गोपाल सिंह खरव, माखनलाल चतुर्वेदी, अर्जुनलाल सेठी, यह सब केसरी सिंह के वर्धा में प्रमुख साथी थे।

1 अगस्त 1941 से उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई थी।वह कोटा में डॉ विद्याशंकर की देख़भाल में इलाज करवा रहे थे। अंतिम दिनों में उनकी पोत्री राजलक्ष्मी ही उनके साथ रहती थी। वे बताती है की केसरी सिंह जी अंतिम दिलों में गीता तथा उपनिषदों के पाठ करने में मस्त रहते थे। रवींद्रनाथ ठाकुर की मृत्यु की खबर सुनकर वे काफी आहत हो गए थे। जिसके बाद 14 अगस्त 1941 में उन्होंने आखिरी शब्द “हरि ओम तत्सत” कह कर प्राण त्याग दिए। ऐसे महान क्रांतिकारी सदैव सदैव के लिए अमर हो गए।

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