जानें, मुजफ्फरपुर में क्रांति की बिगुल फूंकने वाले वीर सपूत शहीद खुदीराम बोस की जीवनी

जानें, मुजफ्फरपुर में क्रांति की बिगुल फूंकने वाले वीर सपूत शहीद खुदीराम बोस की जीवनी

महान क्रन्तिकारी और देश के सबसे कम उम्र में शहीद होने वाले खुदीराम बोस जी का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। इनका परिवार कायस्थ परिवार से वास्ता रखते थे। देशभक्ति की ज्वाला बचपन से बोस जी के जेहन में थी।

बचपन से उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए देश की आजादी में अल्प किन्तु अहम योदगान निभाया। उनके इस अदम्य साहस से देशभर में क्रांति की ज्वाला धधक उठी। खासकर बंगाल के युवाओं में जोश की ज्वाला भड़क उठी। उनके दिवंगत होने के पश्चात तत्कालीन युवाओं ने उनके नाम की धोती पहनने की शुरुआत की।

जैसा कि इतिहास में निहित है कि खुदीराम जी धोती और कुर्ता ही पहनते थे। महज 19 वर्ष की आयु में उन्होंने हाथ में गीता रखकर ख़ुशी-ख़ुशी फांसी के फंदे पर लटककर शहादत दी। उनकी इस वीरता की वजह से तत्कालीन वायसराय ने नौकरी छोड़ दी और जल्द ही उनकी भी मृत्यु हो गई थी।

बात 30 अप्रैल 1908 की है। जब खुदीराम बोस और प्रफुल्लकुमार चाकी ने किंग्जफोर्ड को बम से उड़ाने की योजना बनाई। इसके बाद दोनों बिहार राज्य में मुजफ्फरपुर के आस-पास उन्होंने किंग्जफोर्ड की बग्घी पर बम फेंकने की कोशिश की। हालांकि, उनकी यह कोशिश नाकाम रही, लेकिन वे दोनों अपने मकसद में कामयाब रहे।

ऐसा कहा जाता है कि बम किंग्जफोर्ड के साथ आने वाले एक अन्य बग्घी पर जा गिरी। इस बम के प्रहार की चपेट में आने से बग्घी में बैठे दो महिला की मौत हो गई। इसके बाद दोनों वहां से भाग निकलने में कामयाब रहे, लेकिन पुलिस पीछे पड़ी रही और वैनी रेलवे स्टेशन पर दोनों को घेर लिया।

इस समय क्रन्तिकारी चाकी ने गोली मारकर खुद को शहीद कर लिया, लेकिन खुदीराम जी पकड़े गए और उन्हें 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दे दी गई। चाकी और खुदीराम जी को शत शत नमन।

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