65 बलिदानी नामधारियों की शौर्यगाथा, मातृभूमि और गौरक्षा के लिए तोप से उड़ना किया स्वीकार!

65 बलिदानी नामधारियों की शौर्यगाथा, मातृभूमि और गौरक्षा के लिए तोप से उड़ना किया स्वीकार!

जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल,
वाहे गुरु जी की खालसा, वाहे गुरु जी की फतेह’
सिख धर्म शांति और न्याय की प्रतिमूर्ति है। इस धर्म में संगत और पंगत दो ऐसे शब्द हैं, जो समस्त समाज को एक सूत्र में बांधने की कोशिश करते हैं। हालांकि, जब बात शौर्यता और वीरता की आती है, तो इस अग्नि परीक्षा में सिख धर्म के अनुयायी प्रथम पंक्ति में खड़े पाए जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि धर्म और देश की रक्षा हेतु सबसे अधिक आहुति सिक्खों ने दी हैं। उनकी वीरता और शौर्यता को दंडवत प्रणाम। हालांकि, इनकी वीरता की गाथा बहुत लंबी है। उसे महज शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता है। फिर भी आज सीमा संघोष की तरफ से मैं आपको इनकी वीरता की एक विजय गाथा प्रस्तुत करने जा रहा हूं। आइए जानते हैं-

बात 19 वीं शताब्दी के मध्य की यानी 1864 ई.की है। जब सिखों के बाबा रामसिंह कूका ने अन्याय के विरोध के लिए नामधारी सम्प्रदाय की स्थापना की। तत्काल समय में वह पहले गुरु और नेता थे, जिसने अपने धर्म के लोगों को शाश्त्र और शस्त्र की मदद से अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने की बात की। उनके इस प्रयास का सर्वप्रथम विरोध किया गया, लेकिन अंग्रेजों की करतूत को ध्यान में रखते हुए लोगों ने उन्हें अपना क्रांतिकारी गुरु मान लिया।

इसके बाद स्थानीय लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत का कड़ा विरोध किया। इससे आहत होकर अंग्रेजों ने कूका समुदाय पर बड़े अत्यचार किये, लेकिन फिर भी कूका समुदाय के लोगों ने विरोध जारी रखा। इसके बाद अंग्रेजों ने मुस्लिम वर्ग की मदद से इन्हें मानसिक पीड़ा देने की कोशिश की।

इस पीड़ा में मुस्लिम समुदाय द्वारा 1872 में गौ वध किया जा रहा था। इस जघन्य अपराध का नामधारी समुदाय ने कड़ा विरोध किया और दोनों समुदायों के बीच जंग छिड़ गई। उस समय अंग्रेजों ने कूका समुदाय के लोगों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें मलेरकोटला में तोपों से उड़ा दिया गया।

ऐसा कहा जाता है कि 17 जनवरी, 1872 को 49 नामधारियों को 18 जनवरी को 16 और नामधारियों को तोपों से उड़ा दिया गया। जब उनसे पूछा गया था कि आपको किस तरह सजा दी जाए। उस समय भी नामधारियों ने जान की परवाह किए बिना और वीरता का परिचय देते हुए छाती पर प्रहार करने को कहा था।

इस घटना में एक 12 वर्षीय बच्चे को तोप से उड़ा दिया गया था। उस समय लोगों ने बच्चे को क्षमा करने की बात कही थी, लेकिन शेरदिल बच्चे ने माफ़ी नहीं मांगी और अंग्रेज की दाढ़ी जोर से पकड़ ली। यह देख उस अंग्रेज ने बच्चे के दोनों हाथ काटकर तोप के सामने खड़ा कर दिया। इसके बावजूद वह सपूत हिला नहीं और वीरगति हो गया। जबकि गुरु रामसिंह को गिरफ्तार कर म्यांमार भेज दिया गया। जहां 1885 में उनकी मृत्यु हो गई।

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