जानें, बांग्लादेश को विजय दिलाने वाले तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ की जीवनी

जानें, बांग्लादेश को विजय दिलाने वाले तत्काल थलसेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ की जीवनी

सैम मानेकशॉ अपनी शौर्य, पराक्रम और वीरता के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। आज शॉ हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कीर्ति आज भी अमर हैं। आप कई बार साहसी और सराहनीय सैन्य कार्य करने के लिए सम्मानित हो चुके हैं। आपको
पद्म विभूषण, पद्म भूषण और सैन्य क्रॉस जैसे विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया है।
आपका जन्म जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था। आपका संबंध पारसी परिवार से था। आपने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में प्राप्त की। जबकि उच्च शिक्षा देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी से प्राप्त की। इसके बाद अपने सेना ज्वाइन की और देशहित के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

इसी दौरान आपका पाकिस्तान जाना हुआ। जहां आपकी मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई। यह मुलाकत 1937 में हुई और इसके दो वर्ष बाद आप दोनों ने शादी कर ली। इसके बाद आपने अपना पूरा ध्यान देश सेवा पर दी। इस दरम्यान द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और आपको बड़ी जिम्मेवारी दी गई। जब ब्रिटिश हुकूमत ने आपको ब्रितानी फ़ौज की कमान संभाली। साथ ही आपने 10 हजार युद्ध बंदियों को पनाहगार देने की व्यवस्था करवाई। इस अभियान में आपकी भूमिका अहम रही।

इसके बाद आप अपने जीवन में शौर्य और पराक्रम की ऐसी रचना की। आज संपूर्ण विश्व आपको हर्षपूर्वक स्मरण करती है। आपने भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद सेना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके बाद आपको गोरखों को संभालने की जिम्मेवारी दी गई। गोरखा बटालियन को संभालने वाले आप पहले भारतीय अधिकारी बने।

इसी समय आपका नाम सैम बहादुर पड़ा। जब गोरखा जवानों ने आपको सैम बहादुर की उपाधि प्रदान की। आपने नागालैंड समस्या को सुलझाने में पूर्व की भांति अहम भूमिका निभाई। आपके इस सराहनीय कार्य के लिए 1968 में आपको पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

आपकी वीरता और आपको शत शत नमन

इसके साथ ही आपको अगले वर्ष थल सेना अध्यक्ष बनाया गया। अपने जनरल कुमारमंगलम का स्थान ग्रहण किया। इसके बाद बांग्लादेश को आजाद करने में आपने अहम् भूमिका निभाई। अपने युद्धभूमि में ऐसी चक्रव्यूह की रचना की, जिसमें दुश्मन देश बुरी तरह फंस गया और फिर दुनिया आपका साक्षी बना। जब आपने पाकिस्तान से सरेंडर करवाया।

दो वर्ष उपरांत आपको फील्ड मार्शल ओहदा से सम्मानित किया गया। आप सेवानिवृत होने के बाद तमिलनाडु के शहर वेलिंगटन में जाकर बस गए और इसी शहर में आपने 27 जून 2008 की रात को अपनी अंतिम सांस ली। आपकी वीरता और आपको शत शत नमन।

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